बर्लिन ग्लोबल डायलॉग: केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल बोले—ग्लोबल साउथ को दिए गए जलवायु वित्त के वादे खोखले साबित हुए

बर्लिन ग्लोबल डायलॉग: केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल बोले—ग्लोबल साउथ को दिए गए जलवायु वित्त के वादे खोखले साबित हुए

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के मंच से अमीर राष्ट्रों और यूरोपीय संघ की जलवायु नीतियों पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट आरोप लगाया कि ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण के लिए जिम्मेदार विकसित मुल्क विकासशील देशों को सालाना 100 अरब डॉलर की क्लाइमेट फंडिंग मुहैया कराने की अपनी बुनियादी प्रतिबद्धता को पूरा करने में विफल साबित हुए हैं।

गोयल ने कहा कि पेरिस समझौते के तहत कमजोर अर्थव्यवस्थाओं और द्वीपीय राष्ट्रों को डीकार्बोनाइजेशन और तकनीकी सहयोग के लिए आर्थिक संबल देने की बात कही गई थी, लेकिन एक दशक से अधिक का समय बीतने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई आर्थिक सहायता नहीं पहुंची है। उन्होंने इसे मात्र वादों तक सीमित रहने वाला रवैया करार दिया।

पेरिस में आयोजित COP21 का संदर्भ देते हुए केंद्रीय मंत्री ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस दौरान विकासशील दुनिया की आवाज को मजबूती दी थी। उस वार्ता में यह सहमति बनी थी कि पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर समृद्धि हासिल करने वाले विकसित देश क्षतिपूर्ति के रूप में सालाना 100 अरब डॉलर का कोष उपलब्ध कराएंगे, जिसका लाभ प्रशांत और कैरेबियाई द्वीपों सहित तमाम जरूरतमंद देशों को मिलना था।

उन्होंने आगे कहा कि 2009 के कोपेनहेगन सम्मेलन (COP15) में 2020 तक के लिए तय किए गए इस लक्ष्य की समयसीमा को आगे बढ़ाकर 2025 तो कर दिया गया, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा। यूरोपीय संघ की आयात नीतियों और CBAM तंत्र पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्थान इस विफलता पर कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे पा रहे हैं।

उत्सर्जन के असंतुलन को आंकड़ों के जरिए स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विश्व की 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से भी नीचे है। इसके विपरीत, यूरोप महज 3 से 4 प्रतिशत जनसंख्या के साथ इस समस्या के बड़े हिस्से के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों का प्रति व्यक्ति प्रभाव भारत के मुकाबले कहीं अधिक है, जबकि भारत अपशिष्ट प्रबंधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था को लेकर अधिक सतर्क है।

अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के दायित्वों को निभाते हुए भी भारत हरित ऊर्जा के क्षेत्र में पीछे नहीं है। देश अपनी विकास जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ विश्व के सबसे तीव्र स्वच्छ ऊर्जा बदलाव का नेतृत्व पूरी निष्ठा से कर रहा है।

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