आज का दिन सुप्रीम कोर्ट के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जहाँ राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा राज्य सरकारों के विधेयकों को मंजूरी देने में देरी से संबंधित याचिका पर सुनवाई होनी है। आज विपक्षी दल इस मामले में अपनी दलीलें रखेंगे, जो एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
पिछली सुनवाई में, भाजपा शासित राज्यों के वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया था कि विधेयकों पर मंजूरी देना या रोकना राज्यपाल का विशेषाधिकार है और इसमें कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस तर्क पर मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा था, “अगर कोई व्यक्ति 2020 से 2025 तक बिलों को रोककर रखता है, तो क्या कोर्ट को बेबस होकर बैठ जाना चाहिए?”
CJI ने केंद्र सरकार से भी एक अहम सवाल पूछा: क्या सुप्रीम कोर्ट को ‘संविधान के संरक्षक’ के रूप में अपनी जिम्मेदारी को छोड़ देना चाहिए? यह सवाल इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 15 मई, 2025 को अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों पर 14 सवालों के जवाब मांगे थे। इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई CJI बी.आर. गवई के नेतृत्व में पाँच जजों की बेंच कर रही है, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चांदूरकर भी शामिल हैं।