ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज डॉटकॉम द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, इस सप्ताह भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3.91 रुपये प्रति लीटर यानी 4.4 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। तेल उत्पादक देशों को छोड़ दें, तो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत द्वारा की गई यह मूल्य वृद्धि सबसे कम रही है।
इंडियन ऑयल के एक अधिकारी के मुताबिक, ईंधन की कीमतों में की गई यह मामूली बढ़ोतरी कच्चे तेल के वैश्विक दामों में हुई भारी वृद्धि का एक छोटा सा हिस्सा भर है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने पिछले 76 दिनों तक खुद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ उठाया और उपभोक्ताओं को इससे बचाए रखा। इसके विपरीत, दुनिया के अन्य देशों ने कच्चे तेल की लागत बढ़ने पर अपने यहाँ ईंधन की कीमतों में 10 से 90 प्रतिशत तक का इजाफा कर दिया है।
रिपोर्ट दर्शाती है कि म्यांमार, पाकिस्तान, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से कहीं अधिक बढ़ गई हैं। उदाहरण के तौर पर, पाकिस्तान में उपभोक्ताओं को तीन महीने पहले की तुलना में करीब 55 प्रतिशत, मलेशिया में 56 प्रतिशत और यूएई में 52 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। विकसित देशों का हाल भी अलग नहीं है; अमेरिका में पेट्रोल 45 और डीजल 48 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। इसी तरह यूके, जर्मनी और फ्रांस में भी ईंधन के दामों में दो अंकों में वृद्धि देखी गई है।
भारत में इस वृद्धि के बावजूद, सरकारी तेल कंपनियों के घाटे में केवल आंशिक कमी आई है। पहले इन कंपनियों को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण हर दिन 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा था, जो अब घटकर 750 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है।
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारत इस मामले में अपवाद रहा है, क्योंकि 15 मई 2026 तक तेल विपणन कंपनियों ने 23 फरवरी 2026 की कीमतों को ही बनाए रखा था। इस दौरान कंपनियों ने रिफाइनरी स्तर पर खुद लागत का बोझ सहकर उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की, जिससे उन्हें प्रतिदिन भारी नुकसान उठाना पड़ा।