सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज एक बड़ा फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा की जा रही यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग का यह कदम जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे जुड़े वैधानिक नियमों की कसौटी पर बिल्कुल खरा उतरता है, इसलिए इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कई अहम बिंदुओं पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। पीठ के समक्ष यह मुख्य सवाल था कि क्या चुनाव आयोग को वर्तमान स्वरूप में एसआईआर आयोजित करने का अधिकार है और क्या इस प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकों की राष्ट्रीयता तय करने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि केवल प्रक्रियात्मक तौर-तरीकों पर सवाल उठाकर इस व्यापक मुहिम को गैर-कानूनी घोषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार है।
अदालत ने उन दलीलों को भी सिरे से नकार दिया, जिनमें दावा किया गया था कि इस प्रक्रिया से आम मतदाताओं पर खुद को सही साबित करने का अतिरिक्त मानसिक या कानूनी बोझ पड़ेगा। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि यदि कोई नागरिक अपने पुराने निवास स्थान को छोड़कर किसी नए स्थान पर रहने लगा है, तो भी वह पुरानी व्यवस्था से बाहर नहीं होता, क्योंकि उसका अथवा उसके परिवार का विवरण पुराने रिकॉर्ड में सुरक्षित रहता है। आयोग द्वारा दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचने की कार्रवाई को किसी भी तरह से मनमाना नहीं कहा जा सकता।
फैसले में यह साफ किया गया कि निर्वाचन आयोग का उद्देश्य किसी भी वैध नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से वंचित करना या उनका नाम मतदाता सूची से हटाना नहीं है। यदि कोई दस्तावेज अपूर्ण या संदेहास्पद पाया जाता है, तो आयोग नाम दर्ज करने से मना अवश्य कर सकता है, लेकिन इस कार्रवाई को नागरिकता निर्धारण की प्रक्रिया नहीं माना जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि इतने बड़े स्तर के कार्यों को संपन्न कराने के लिए नियम और दिशा-निर्देश तय करने का पूरा अधिकार चुनाव आयोग के पास सुरक्षित है।
इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जिन लोगों की नागरिकता के संबंध में आयोग को संदेह है, उनकी सूची चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार या संबंधित सक्षम प्राधिकारी को सौंप दी जाए। अदालत ने निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी को अगले चुनाव की शुरुआत से पहले इन मामलों पर अपना अंतिम निर्णय ले लेना होगा। पीठ ने दोहराया कि नागरिकता का अंतिम फैसला करना आयोग का काम नहीं है, बल्कि वह ऐसे संदिग्ध मामलों को आगे की जांच के लिए सरकार को अग्रसारित कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के विरोध में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), पीयूसीएल जैसे प्रमुख नागरिक संगठनों के साथ-साथ कई विपक्षी राजनेताओं ने याचिकाएं दायर की थीं। इन याचिकाकर्ताओं में राज्यसभा सांसद मनोज झा, महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता के. सी. वेणुगोपाल, सांसद पप्पू यादव और राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुधाकर सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे।