नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा है कि भारत में पेट्रोल और डीजल का प्रचुर भंडार मौजूद है, जिससे घरेलू और औद्योगिक दोनों क्षेत्रों की मांग को आसानी से पूरा किया जा सकता है। सरकार ने आम जनता से किसी भी तरह की भ्रामक खबरों पर विश्वास न करने का आग्रह किया है। इसके साथ ही ईंधन केंद्रों पर संयमित व्यवहार बनाए रखने की अपील की गई है ताकि आपूर्ति व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।
आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से सरकार ने बताया कि भारत वर्तमान में तेल शोधन (रिफाइनिंग) के मामले में वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान पर है। देश के भीतर संचालित 22 रिफाइनरियों की कुल सालाना क्षमता 25.81 करोड़ टन है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जहां देश की आंतरिक खपत 24.32 करोड़ टन दर्ज की गई, वहीं भारत ने इसी दौरान 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का विदेशों में निर्यात भी किया। ये आंकड़े प्रमाणित करते हैं कि भारत परिष्कृत तेल उत्पादों के बड़े वैश्विक निर्यातकों में से एक है।
समीक्षा बैठकों का हवाला देते हुए मंत्रालय ने कहा कि केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी लगातार सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों, प्रांतीय सरकारों और व्यापारिक संगठनों के साथ समन्वय बनाए हुए हैं। इसी क्रम में मंत्रालय के सचिव ने राज्यों के मुख्य सचिवों और फिक्की व सीआईआई जैसे उद्योग मंडलों के साथ मौजूदा हालात का जायजा लिया। इस उच्च स्तरीय बैठक में यह बात उभरकर आई कि ईंधन की कोई वास्तविक किल्लत नहीं है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में कीमतों के अंतर का नाजायज फायदा उठाने की कोशिशों के कारण कृत्रिम संकट का माहौल बनाया जा रहा है।
पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव का उल्लेख करते हुए सरकार ने बताया कि आम नागरिकों को महंगाई से बचाने के लिए सरकारी तेल कंपनियां बड़ा आर्थिक बोझ उठा रही हैं। ये कंपनियां पेट्रोल, डीजल और घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) पर रोजाना करीब 550 करोड़ रुपये का नुकसान खुद झेल रही हैं। इस सब्सिडी का मुख्य उद्देश्य आम परिवारों, कृषि कार्य में लगे किसानों और दोपहिया वाहन चालकों को राहत देना है, जबकि औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप अलग दरें निर्धारित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ औद्योगिक उपभोक्ता नियमों का उल्लंघन कर कमर्शियल चैनलों के बजाय रिटेल पंपों से ईंधन की खरीदारी कर रहे हैं। इस अनधिकृत खरीद के कारण खुदरा केंद्रों पर अचानक दबाव बढ़ गया है। निजी तेल कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने के कारण उनके रिटेल आउटलेट्स और थोक खरीदारों की तरफ से हाई-स्पीड डीजल की मांग में लगभग 38 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अतिरिक्त, सरकारी कंपनियों के थोक वॉल्यूम में भी 29 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है, जिससे यह पूरा दबाव अब सरकारी पेट्रोल पंपों पर स्थानांतरित हो गया है।
कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उद्योग संगठनों से कहा गया है कि वे अपने सदस्यों को निर्धारित नियमों के उल्लंघन के प्रति सचेत करें। वहीं, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेष दस्तों का गठन करने की हिदायत दी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अवैध भंडारण, ईंधन के डायवर्जन और खुदरा आपूर्ति के दुरुपयोग के खिलाफ दंडात्मक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। नागरिकों से दोबारा अपील की गई है कि वे केवल आधिकारिक बयानों पर भरोसा करें।