मध्य प्रदेश में ‘स्वावलंबी गौशाला नीति 2025’ की समीक्षा, राज्यमंत्री लखन पटेल ने जारी किए जरूरी दिशा-निर्देश

मध्य प्रदेश में ‘स्वावलंबी गौशाला नीति 2025’ की समीक्षा, राज्यमंत्री लखन पटेल ने जारी किए जरूरी दिशा-निर्देश

पशुपालन एवं डेयरी विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री लखन पटेल ने बुधवार को मंत्रालय में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान गौसंवर्धन बोर्ड के कामकाज और ‘स्वावलंबी गौशाला नीति 2025’ की प्रगति की विस्तृत समीक्षा की। इस बैठक में मुख्य रूप से गोकुल धाम स्थापना नीति के तहत जारी की गई निविदाओं और प्राप्त प्रस्तावों पर गंभीर मंथन किया गया। राज्यमंत्री ने जमीनी स्तर पर कार्यों को गति देने के लिए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए।

बैठक के दौरान राज्यमंत्री श्री पटेल ने भूमि आवंटन और गौवंश प्रबंधन के नियमों को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि इस नीति के अंतर्गत संचालित होने वाली परियोजनाओं में कम से कम 5,000 गौवंश का रख-रखाव अनिवार्य होगा, जिसमें से 30 प्रतिशत गौवंश दुधारू नस्ल का होना आवश्यक है। भूमि के संबंध में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक 5,000 गौवंश के लिए ‘उपयोग के अधिकार’ (यूजर राइट्स) के आधार पर अधिकतम 125 एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। यदि गौवंश की संख्या में 1,000 की बढ़ोतरी होती है, तो 25 एकड़ अतिरिक्त भूमि दी जाएगी। इसके अलावा, व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 5 एकड़ अलग से आवंटित की जा सकेगी। वर्तमान में निराश्रित गौवंश के भरण-पोषण के लिए सरकार की ओर से प्रति गौवंश 40 रुपये रोजाना की आर्थिक सहायता दी जा रही है।

राज्यमंत्री ने इस नीति के दूरगामी उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मध्य प्रदेश स्वावलंबी गौशाला (गोकुल धाम) स्थापना नीति 2025 का मुख्य लक्ष्य राज्य में आत्मनिर्भर और बड़े आकार के गौशाला मॉडल विकसित करना है। इससे निराश्रित गौवंश को व्यवस्थित आवास, संतुलित भोजन और बुनियादी सुविधाएं मिल सकेंगी। उन्होंने आगे कहा कि इस योजना से सरकारी खजाने पर कम से कम बोझ डालते हुए अधिक से अधिक लावारिस मवेशियों की बेहतर देखभाल संभव होगी। साथ ही, बंजर भूमि का विकास होगा और निजी भागीदारी के जरिए गौ-उत्पादों के निर्माण व उनकी बिक्री के लिए एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जिससे वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में निजी निवेश के अनुकूल अवसर पैदा होंगे।

विभाग की भावी योजनाओं का जिक्र करते हुए राज्यमंत्री ने कहा कि निराश्रित मवेशियों के उचित प्रबंधन और उनकी उपयोगिता बढ़ाने के लिए व्यावसायिक स्तर पर इन गौशालाओं को खड़ा किया जाएगा। निजी क्षेत्र के निवेश से गोपालन, दूध प्रोसेसिंग, जैविक खाद, पंचगव्य, बायोगैस (बायो-सीएनजी), आयुर्वेद दवाओं और पर्यटन क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा। दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए गिर, साहीवाल और थारपारकर जैसी उन्नत नस्लों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिसमें कृत्रिम गर्भाधान और सेक्सड सॉर्टड सीमेन तकनीक की मदद ली जाएगी। इसके अलावा, गोबर और कृषि कचरे से एनपीके युक्त जैविक खाद बनाकर मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाई जाएगी। बायोगैस, सीएनजी और सौर ऊर्जा संयंत्रों के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाएगा, जबकि प्राकृतिक और सुंदर स्थानों पर स्थित गौशालाओं को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।

इस महत्वपूर्ण बैठक में अधिकारियों ने बताया कि प्रदेश के 13 जिलों—रायसेन, दमोह, जबलपुर, सागर, अशोकनगर, खरगोन, रीवा, बैतूल, पन्ना, भिण्ड, राजगढ़, भोपाल और मंडला—में चिन्हित जमीनों की रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है। राज्यमंत्री ने साझा किया कि निविदा प्रक्रिया के तहत अब तक 14 स्थानों के लिए प्रस्ताव मिले हैं, जिनमें 16 निवेशकों ने रुचि दिखाई है। इन प्रस्तावों के माध्यम से कुल 3,457 एकड़ भूमि पर करीब 1,30,000 गौवंश को रखने की क्षमता विकसित की जाएगी। बैठक में पशुपालन एवं डेयरी विभाग के प्रमुख सचिव श्री उमाकांत उमराव, संचालक डॉ. पी.एस. पटेल, गौसंवर्धन बोर्ड के रजिस्ट्रार डॉ. अनुपम अग्रवाल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

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