अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में तकरीबन एक प्रतिशत की बड़ी गिरावट देखी गई। ओपेक प्लस देशों द्वारा आगामी अगस्त महीने से कच्चे तेल के उत्पादन में वृद्धि करने के निर्णय और होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के रास्ते आपूर्ति व्यवस्था बहाल होने के कारण दामों में यह कमी दर्ज की गई है। इस कारोबारी उतार-चढ़ाव के बीच ब्रेंट क्रूड का भाव 0.76 फीसदी यानी 55 सेंट टूटकर 71.55 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी लगभग 1 प्रतिशत (68 सेंट) की कमजोरी के साथ 69 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से नीचे आ गया।
सऊदी अरब और रूस की अगुवाई वाले सात प्रमुख तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस ने अगस्त के लिए अपने दैनिक उत्पादन लक्ष्य में 1,88,000 बैरल की बढ़ोतरी करने की मंजूरी दे दी है। यह कदम साल 2023 में लागू की गई स्वैच्छिक उत्पादन कटौती की नीति को क्रमिक रूप से समाप्त करने की रणनीति का हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस नए उत्पादन लक्ष्य को पूरी तरह अमलीजामा पहनाया जाता है, तो बाजार में कुल उत्पादन कोटा बढ़कर करीब 9,40,000 बैरल प्रतिदिन हो जाएगा, जो कि दुनिया भर की कुल तेल मांग के लगभग एक प्रतिशत हिस्से के बराबर है।
दूसरी ओर, भू-राजनीतिक मोर्चे पर अमेरिका और ईरान के मध्य हुए एक अंतरिम शांति समझौते के बाद क्षेत्रीय गतिरोध में काफी कमी आई है। इस शांति पहल के चलते होर्मुज स्ट्रेट से होने वाला तेल का परिचालन सामान्य हो गया है, जिससे खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख उत्पादक देशों का निर्यात काफी बढ़ गया है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी इस मार्ग से अपनी वैश्विक तेल सप्लाई को पूर्व के स्तर पर पहुंचा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ी है और खासकर एशियाई देशों के बाजारों में अधिशेष (सरप्लस) की स्थिति पैदा हो गई है।
बाजार के जानकारों का आकलन है कि उत्पादन में की गई यह ताजा वृद्धि वर्ष 2023 में की गई कटौती को पूरी तरह वापस लेने के अंतिम दौर का हिस्सा है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि आगामी सितंबर महीने में ओपेक प्लस देश आपूर्ति में एक और बढ़ोतरी कर सकते हैं, जिससे आने वाले समय में कीमतों पर और अधिक मंदी का दबाव देखने को मिल सकता है। कच्चे तेल के दामों में आ रही इस लगातार गिरावट के कारण आने वाले दिनों में ओपेक से जुड़े वैश्विक उत्पादकों के बीच अपनी बाजार हिस्सेदारी को बचाए रखने के लिए होड़ बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।