प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इंडोनेशियाई संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक नई दिशा देने वाला बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच का जुड़ाव केवल कूटनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक, लोकतांत्रिक और समुद्री विरासत पर आधारित है। इस दौरान प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम देने के उद्देश्य से पांच स्तंभों वाले ‘गंगा-महाकाम विजन’ की घोषणा की, जो आने वाले समय में वैश्विक भलाई का मार्ग प्रशस्त करेगा।
संसद में मिले अभूतपूर्व स्वागत और इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए आभार व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सत्कार 140 करोड़ भारतीय नागरिकों के प्रति वहां की जनता के गहरे प्रेम को दर्शाता है। उन्होंने इस सम्मान को दोनों देशों की लोकतांत्रिक साझीदारी और साझा मूल्यों को समर्पित किया। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो सहित सभी सांसदों का धन्यवाद करते हुए इस आत्मीयता को अपने जीवन के सबसे अमूल्य क्षणों में से एक बताया।
दोनों राष्ट्रों के बीच की ऐतिहासिक कड़ियों का उल्लेख करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि भारत और इंडोनेशिया केवल एक समुद्र से नहीं, बल्कि रामायण, महाभारत, नालंदा, गरुड़ और बोरोबुदुर जैसी महान सांस्कृतिक विरासतों से आपस में जुड़े हैं। उन्होंने गुजरात और इंडोनेशिया के प्राचीन व्यापारिक संबंधों की चर्चा करते हुए पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो के उस कथन को याद किया जिसमें उन्होंने दोनों देशों के संबंधों को रक्त और संस्कृति का अटूट रिश्ता बताया था।
लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत और तीसरे सबसे बड़े लोकतंत्र इंडोनेशिया ने अपनी विविधता को कमजोरी नहीं बल्कि अपनी सबसे बड़ी शक्ति बनाया है। प्रधानमंत्री के अनुसार, दोनों देशों के लोकतांत्रिक अनुभव पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी हैं। इसके साथ ही उन्होंने इंडोनेशिया के ‘एमास 2045’ विजन और भारत के ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए कहा कि युवा आबादी और मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण दोनों देश भविष्य के स्वाभाविक सहयोगी हैं।
रणनीतिक और तकनीकी मोर्चे पर सहयोग को बढ़ावा देने की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री ने अंतरिक्ष, सैटेलाइट, समुद्री सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल डोमेन में मिलकर काम करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि भारत इंडोनेशिया में उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र विकसित करने में हरसंभव सहायता के लिए तैयार है। इसके अलावा, उन्होंने आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और डी-रेडिकलाइजेशन जैसे वैश्विक खतरों के खिलाफ भी साझीदारी मजबूत करने की बात कही।
वैश्विक परिदृश्य का जिक्र करते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों को समय की मांग बताया और आसियान की केंद्रीय भूमिका का समर्थन किया। उन्होंने ब्रिक्स समूह में इंडोनेशिया की सदस्यता की सराहना की। अंत में, तुलसीदास की चौपाई और इंडोनेशियाई कहावत ‘ताक केनाल माका ताक सायांग’ के माध्यम से लोगों के आपसी संपर्क और पर्यटन को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए उन्होंने दोनों देशों को ‘पार्टनर्स फॉरएवर’ (सदैव के साझेदार) बताया।