क्षेत्रीय विविधताओं के अनुकूल शासन व्यवस्था के लिए राज्यों के बीच अनुभवों का साझा होना जरूरी: डॉ. जितेंद्र सिंह

क्षेत्रीय विविधताओं के अनुकूल शासन व्यवस्था के लिए राज्यों के बीच अनुभवों का साझा होना जरूरी: डॉ. जितेंद्र सिंह

केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने उत्तराखंड के मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (एलबीएसएनएए) में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारियों के फेज-IV मिड-करियर ट्रेनिंग प्रोग्राम के 21वें दौर के समापन सत्र को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की विविधता सिर्फ समाज और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी झलक हमारी शासन-व्यवस्था में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसी वजह से देश की क्षेत्रीय विविधताओं के अनुरूप एक बेहतर प्रशासनिक तंत्र विकसित करने के लिए विभिन्न राज्यों के बीच निरंतर सीखने और एक-दूसरे की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को साझा करने की बड़ी जरूरत है।

डॉ. सिंह ने बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माण के लिए पदानुक्रम (हेरार्की) की बाधाओं को दूर करने की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया को केवल वरिष्ठता की सीमा में नहीं बांधा जाना चाहिए। धरातल पर काम करने वाले और नीतियों के क्रियान्वयन से सीधे जुड़े अधिकारियों से अक्सर व्यावहारिक एवं नवाचार से भरे महत्वपूर्ण सुझाव मिलते हैं। केंद्रीय मंत्री के अनुसार, पूरे सेवाकाल के दौरान लगातार सीखते रहने की ललक ही एक प्रभावी और सफल नेतृत्व की असली पहचान है।

सरकारी और निजी क्षेत्र के बदलते रिश्तों पर चर्चा करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दोनों के बीच की पारंपरिक दूरी अब समाप्त हो रही है और इसकी जगह सहयोग आधारित मॉडल विकसित हो चुका है। उन्होंने अंतरिक्ष क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां स्टार्टअप्स और निजी भागीदारी तेजी से बढ़ी है। जब सरकार केवल एक नियामक की भूमिका से आगे बढ़कर सहयोगी के रूप में काम करती है, तब नवाचार को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलता है। आज भारत तकनीक के माध्यम से प्रगति और नवाचार आधारित विकास की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

प्रशासन में मानवीय दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सुशासन का असली महत्व तभी है जब तकनीकी विकास के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इस संदर्भ में उन्होंने सरकार द्वारा किए गए कई कल्याणकारी नीतिगत बदलावों का जिक्र किया, जिनमें पारिवारिक पेंशन के लिए नामांकन प्रक्रिया को लचीला बनाना, मृत बच्चे के जन्म (स्टिलबर्थ) के मामलों में महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ देना और निर्धारित सेवा अवधि पूरी होने से पहले जान गंवाने वाले सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों को पारिवारिक पेंशन का अधिकार देना शामिल है। उन्होंने कहा कि ये सभी सुधार नागरिक-केंद्रित शासन की सोच को प्रमाणित करते हैं।

सिविल सेवा प्रशिक्षण को समय की मांग के अनुसार आधुनिक बनाने पर जोर देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इसके लिए संस्थागत सहयोग को बढ़ाने, संकाय (फैकल्टी) में विविधता लाने और बदलते सामाजिक-तकनीकी परिवेश के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने जिलों और मंत्रालयों में तैनात युवा अधिकारियों को भी इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में बतौर संकाय सदस्य शामिल करने की वकालत की, ताकि जमीनी अनुभवों का लाभ मिल सके।

प्रशासनिक कामकाज में संवाद की अहमियत बताते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक अधिकारियों में जनता, मीडिया और जनप्रतिनिधियों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने का कौशल होना अनिवार्य है। इसके साथ ही उन्होंने प्रशिक्षण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रशिक्षुओं से व्यवस्थित और पूरी तरह गोपनीय (गुमनाम) फीडबैक लेने की व्यवस्था शुरू करने की बात कही, जिससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किया जा सके।

भाषण के समापन पर केंद्रीय मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम से लौटने वाले अधिकारी राज्यों के बीच आपसी समन्वय और सीख को और मजबूत करेंगे। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक परिस्थितियों के बावजूद नवाचार आधारित और नागरिक-अनुकूल शासन को बढ़ावा देकर ये अधिकारी ‘विकसित भारत 2047’ के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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