भारतीय मानसून पर अल नीनो का असर अंतिम नहीं, INCOIS की AI प्रणाली ने जारी की चेतावनी: डॉ. जितेंद्र सिंह

भारतीय मानसून पर अल नीनो का असर अंतिम नहीं, INCOIS की AI प्रणाली ने जारी की चेतावनी: डॉ. जितेंद्र सिंह

लोकसभा में केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में बताया कि मई 2026 में प्रभावी हुआ एल नीनो जून 2026 से लेकर फरवरी 2027 तक सक्रिय रह सकता है। INCOIS की एआई/एमएल प्रणाली ने इसके 70 से 90 प्रतिशत तक बने रहने की संभावना जताई है, हालांकि मंत्री ने यह साफ किया कि अल नीनो के अलावा भी कई अन्य जलवायु परिस्थितियां भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को प्रभावित करती हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पूर्व के आंकड़ों में एल नीनो को बारिश में कमी से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) और मैडेन-जूलियन दोलन (एमजेओ) जैसे घटक भी मानसून की दिशा तय करते हैं। वर्तमान में विकसित हो रही परिस्थितियां अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तापमान बढ़ाकर समुद्री लू (मरीन हीटवेव) की स्थिति पैदा कर सकती हैं। इससे तटीय पारिस्थितिकी, समुद्री जीवों की उत्पादकता और मछलियों के वितरण पर प्रभाव पड़ेगा।

ज्वार-भाटे और महासागरीय लहरों के रुख में बदलाव आने से नौवहन एवं अपतटीय कार्यों में व्यवधान की आशंका है। इसके मद्देनजर सरकार ने ऑपरेटरों की सुरक्षा के लिए उच्च-विभेदन प्रणाली और व्यापक अवलोकन नेटवर्क तैयार किया है। इसमें आर्गो फ्लोट्स, ज्वार गेज, उपग्रह प्रेक्षण और लंगरयुक्त फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है।

तटीय आबादी की सुरक्षा और तैयारियों के लिए आपदा प्रबंधन अभ्यासों तथा हितधारक प्रशिक्षण पर बल दिया जा रहा है। इसके साथ ही, ‘दीप महासागर मिशन’ हेतु इस वित्त वर्ष 145.06 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है, जिसके माध्यम से स्वायत्त जलमग्न वाहनों द्वारा भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में खनिज संसाधनों और जैविक विविधता का व्यापक सर्वेक्षण किया जा रहा है।

तटीय राज्यों की आपदा प्रबंधन क्षमता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों को 10 दिन पूर्व ही महासागरीय तापमान, पवन चक्र और समुद्री धाराओं से जुड़े अलर्ट भेजे जा रहे हैं। केंद्र सरकार ज्वार-भाटा मापन केंद्रों और सुनामी चेतावनी प्रणालियों के विस्तार के साथ-साथ वैज्ञानिक निर्णय-सहायता तंत्र को लगातार सशक्त कर रही है ताकि जलवायु परिवर्तनशीलता की चुनौतियों से प्रभावी रूप से निपटा जा सके।

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