विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट’ (एफसीआरए) में संशोधन का विषय भारत का संप्रभु और आंतरिक मामला है। नई दिल्ली में मीडिया को संबोधित करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने विदेशी चंदा कानून में बदलाव को लेकर अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आई प्रतिक्रियाओं को खारिज कर दिया और दोहराया कि देश के विधायी मामलों का निर्धारण केवल भारत की संसद करती है।
संसद के चालू मानसून सत्र में लोकसभा में प्रस्तुत किए जाने वाले इस विधेयक के जरिए गृह मंत्रालय विदेशी फंडिंग के तीन प्रमुख पहलुओं को नियंत्रित करता है। इसमें विदेशी योगदान स्वीकार करने की पात्रता, चंदे का लेखा-जोखा रखने की प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले विदेशी फंड पर रोक शामिल है। सरकार का रुख है कि बदलती वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में विदेशी प्रभाव से बचाव और पारदर्शिता बनाए रखना सुशासन का एक स्वीकृत हिस्सा है।
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का हवाला देते हुए सरकार ने रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक देश विदेशी धन के घरेलू प्रभावों पर अंकुश लगा रहे हैं। कनाडा द्वारा 2024 में लागू किया गया पारदर्शिता कानून, अमेरिका में 2025 से FARA के अनुपालन में बढ़ाई गई सख्ती, और ब्रिटेन में 1 जुलाई 2025 से लागू नई व्यवस्था इसी वैश्विक रुझान को दर्शाती है। भारत में भी 1976 से लागू यह कानूनी व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है ताकि घरेलू लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनी रहे।
विदेश मंत्रालय की इस ब्रीफिंग में विदेश सचिव के श्रीलंका दौरे की प्रगति रिपोर्ट भी पेश की गई। विदेश सचिव ने श्रीलंका के शीर्ष नेतृत्व—राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित अन्य वरिष्ठ मंत्रियों और अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय वार्ताएं कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय विकास पहलों, मछुआरों के प्रश्नों और चक्रवात ‘दितवाह’ के बाद शुरू की गई नई सहायता योजनाओं की समीक्षा की गई।