उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहा कि 1947 का बंटवारा महज राजनीतिक मानचित्र का बदलाव नहीं, बल्कि भारत की सदियों पुरानी साझी संस्कृति और जीवन मूल्यों का गहरा विभाजन था। उन्होंने स्वतंत्रता को अनमोल और एकता को अनिवार्य बताते हुए कहा कि शांति को कभी भी स्वतः स्थायी मानकर नहीं चला जा सकता।
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) और दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘भारत का विभाजन- विस्थापन, त्रासदी और पुनर्वास की एक गाथा’ था। उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्वतंत्रता हमें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के साथ मिली, लेकिन इसके पीछे एक विशाल मानवीय त्रासदी और विस्थापन का दर्द भी जुड़ा था। इस दिवस को याद करने का मूल उद्देश्य नफरत फैलाना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता पर्व की पूर्व संध्या पर पीड़ितों के संघर्ष को नमन कर आपसी भाईचारे को प्रगाढ़ करना है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश के बच्चों को विभाजन के पूर्ण सत्य को जानने का अधिकार है और इतिहास के इस अध्याय को संक्षिप्त विवरणों में नहीं समेटा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अतीत की विभीषिकाओं से सबक लेकर ही भविष्य की चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जल्दबाजी में खींची गई सीमाओं ने ऐसे दीर्घकालिक सुरक्षा विवाद खड़े किए, जो आज भी भारत की रक्षा प्रणाली और कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। उन्होंने नेतृत्व में दृढ़ इच्छाशक्ति और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिक आधार बनाकर निर्णय लेने पर जोर दिया।
सांस्कृतिक संदर्भों की चर्चा करते हुए उन्होंने तक्षशिला, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, ननकाना साहिब, करतारपुर साहिब और शक्तिपीठों जैसी विरासतों तक भारतीय जनमानस की पहुंच में आए व्यवधानों को साझा क्षति बताया। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे जाति, पंथ अथवा क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पहचान को प्राथमिकता दें, क्योंकि कोई भी पहचान राष्ट्र से बड़ी नहीं हो सकती।
कार्यक्रम के अंत में उपराष्ट्रपति ने 15 विभाजन पीड़ितों को उनके संघर्ष और अनुभवों के योगदान के लिए सम्मानित किया। साथ ही, उन्होंने 2023 से कार्यरत अध्ययन केंद्र द्वारा 100 से अधिक पीड़ितों के मौखिक अनुभवों को संकलित करने और युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने के प्रयासों की प्रशंसा की। संगोष्ठी में डीयू कुलपति योगेश सिंह, आईसीएचआर प्रमुख राघवेंद्र तंवर, बलराम पाणि और विकास गुप्ता सहित अनेक गणमान्य विद्वान एवं शोधार्थी मौजूद रहे।