देश की राजधानी नई दिल्ली में इसी हफ्ते के आखिर में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली (जेएनयू) ने समूह के व्यापक होते आकार पर अपना आकलन प्रस्तुत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स का रणनीतिक व भौगोलिक दायरा पूर्व की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत हो चुका है और यह मंच अब मुख्य रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने वाले अंतर-महाद्वीपीय संगठन में तब्दील हो चुका है।
समूह के क्रमिक विकास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि 2006 में ब्रिक के रूप में शुरू हुए इस सफर में 2009 में दक्षिण अफ्रीका के आने से ब्रिक्स की संरचना बनी। वर्ष 2024 में छह अन्य देशों को सदस्यता की पेशकश की गई, हालांकि घरेलू राजनीतिक कारणों से अर्जेंटीना इससे दूर रहा। इसके बाद वर्ष 2025 में इंडोनेशिया को पूर्ण सदस्य का दर्जा मिला। वर्तमान परिदृश्य में ब्रिक्स के पास 11 पूर्णकालिक और 10 सहयोगी देश हैं, जिसने बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था में इसकी हैसियत को काफी प्रभावशाली बना दिया है।
विकासशील देशों के बढ़ते आकर्षण को रेखांकित करते हुए उन्होंने ध्यान दिलाया कि यह संगठन अंतर-महाद्वीपीय स्तर पर ग्लोबल साउथ के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। कोंडापल्ली ने करीब तीन साल पहले दिए गए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के उस बयान को साझा किया, जिसमें 41 राष्ट्रों द्वारा समूह में शामिल होने के लिए दिए गए आवेदनों का जिक्र था। विश्लेषक के अनुसार, यदि इन सभी देशों को सदस्य बना लिया जाता है, तो यह आंकड़ा यूएन महासभा की कुल सदस्य संख्या का करीब 25 प्रतिशत हो जाएगा।
हालांकि, इस तेज विस्तार से पैदा होने वाली व्यावहारिक मुश्किलों को लेकर भी प्रोफेसर ने सचेत किया है। उन्होंने कहा कि बिना किसी तय औपचारिक नियम-पुस्तिका अथवा चार्टर के संगठन का दायरा बढ़ाने से आंतरिक सहमति कायम करना अत्यंत पेचीदा कार्य बन सकता है। आगामी नई दिल्ली सम्मेलन का सबसे अहम केंद्र बिंदु यही रहेगा कि विस्तार की रफ्तार को फौरन आगे बढ़ाया जाए या फिर मौजूदा सदस्यों के बीच पूर्ण सहमति बनने तक इस प्रक्रिया को विराम दिया जाए, क्योंकि अभी तक इस दिशा में कोई साझा राय नहीं बन सकी है।
यह परिचर्चा इसलिए भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भारत वर्तमान में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे समय में जब यह संगठन खुद को तेजी से उभरते बाजारों के आर्थिक गठजोड़ और विकासशील विश्व की मुखर आवाज के रूप में ढाल रहा है, नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से भविष्य की रूपरेखा तय करने वाले दूरगामी फैसलों की अपेक्षा की जा रही है।