अफगानिस्तान में तालिबान का रवैया फिर बेनकाब हो गया। लड़कियों को महिला टीचरों से पढ़ाई के बयान के बावजूद शनिवार को 36 लाख लड़कियों को सेकंडरी स्कूलों में एंट्री नहीं मिली। लड़कों के स्कूल खुल गए। शिक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में लड़कियों की शिक्षा के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। जबकि पूर्व में तालिबान ने दावा किया था कि 20 साल पहले के राज से अलग इस बार लड़कियों को शिक्षा मुहैया कराई जाएगी।
तालिबान के सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद से अफगानिस्तान में लड़कियों के स्कूल संचालकों ने सारे रिकॉर्ड जला दिए थे। फिलहाल अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के बारे में यूनिसेफ के ही रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। दूसरी तरफ, तालिबान ने पूर्ववर्ती अफगाान सरकार के राज में बनाया गया महिलाओं से जुड़ा मंत्रालय खत्म कर दिया है।
स्कूल नहीं जा पाने वाली एक लड़की का कहना है कि वो वकील बनना चाहती थी। उसने कहा कि अब मैं बस घर में रहूं और उस दिन का इंतजार करूं कि कोई मेरे घर में आकर मेरे से शादी कर लेगा। क्या जिंदगी केवल शादी करना ही है।
अधिकांश लोगों काे चिंता है कि लड़कियों को शरिया के अनुसार केवल धार्मिक शिक्षा ही दी जाएगी। तालिबान पूर्व में सेकंडरी स्कूलों में लड़कियों को शिक्षा का पक्षधर नहीं रहा है। तालिबान राज से पूर्व केवल 16 फीसदी स्कूल ही लड़कियों के थे। वहां केवल एक तिहाई ही महिला टीचर हैं।
सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान के शहरी क्षेत्रों में 70 फीसदी जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 40 फीसदी ही लड़कियां स्कूल जाती हैं। लड़के-लड़कियों के अलग-अलग बैठने के तालिबानी फरमान के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लोग लड़कियों को स्कूल भेजने से कतराते भी हैं।
एशिया फाउंडेशन के सर्वे के अनुसार अफगानिस्तान में बालिका शिक्षा के लिए हर वर्ष अरबों डॉलर का बजट मिलता है। संयुक्त राष्ट्र ग्लोबल एजुकेशन के विशेष प्रतिनिधि गॉर्डन ब्राउन के अनुसार जब तक अफगानिस्तान में लड़कियों को भयमुक्त शिक्षा की गांरटी नहीं मिलती, फंड जारी नहीं किए जाएंगे।