नवजातों को परिष्कृत फॉर्मूला मिल्क पिलाने से उनके दिमागी स्तर यानी आईक्यू पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक शोध के अनुसार सामान्य मिल्क और फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों का दिमागी स्तर बराबर ही रहता है। वैज्ञानिकों ने 11 से 16 साल तक के बच्चों के रिजल्ट का अध्ययन किया। इसमें दोनों ही बच्चे शामिल थे जिन्हें बचपन में सामान्य मिल्क और फॉर्मूला मिल्क पिलाया गया था।
जबकि पूर्व के शोधों के अनुसार ये माना जाता था कि एक्स्ट्रा प्रोटीन, आयरन, कार्बोहाइडेट्र और फैट वाले फॉर्मूला मिल्क पिलाने से नवजाताें के बौद्धिक विकास में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है। वैज्ञानिकों ने नए शोध के लिए इंग्लैंड के 1700 किशोरवय बच्चों का चयन किया गया। इसमें दो वर्गों के बच्चों को शामिल किया गया। पहले वर्ग में वो बच्चे थे जिन्हें बचपन में सामान्य मिल्क दिया गया था और दूसरे वर्ग में वो बच्चें थे जिन्हें फॉर्मूला मिल्क दिया गया।
2018 में शोधकर्ताओं ने दोनों वर्गों के बच्चों के अंग्रेजी और गणित विषय के नंबरों का अध्ययन किया। इसमें सामने आया कि 11 से 16 साल तक के वो बच्चे जिन्हें बचपन में फॉर्मूला मिल्क दिया गया था, उनके नंबर सामान्य दूध पीने वाले बच्चों के समान ही थे। अंग्रेजी विषय में भी दोनों ही वर्गों के बच्चों को समान नंबर ही मिले।
11 साल तक की आयु के बच्चों में ये ट्रेंड थोड़ा अलग मिला। जिन बच्चों को फॉर्मूला मिल्क दिया गया था उनके नंबर अग्रेजी और गणित में सामान्य दूध पीने वाले बच्चों से कम आए। लेकिन शोध में ये साफ नहीं हो पाया कि फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों के 11 साल के आयु वर्ग में इन दोनों विषयों में नंबर कम क्यों आए। शोधकर्ताओं का मानना है कि शोध के नतीजों से फॉर्मूला दूध के प्रति भांतियां दूर हो सकेंगी। साथ ही दूध निर्माता भी फॉर्मूले में बदलाव कर सकेंगे।
विशेषज्ञों ने पाया कि मां का दूध ही नवजात के लिए सर्वोत्तम आहार
नए शोध के आधार पर विशेषज्ञों ने पाया कि नवजात के लिए सर्वोत्तम आहार होता है। इससे नवजात में बीमारियों से लड़ने की क्षमता का विकास होता है। फॉर्मूला आधारित मिल्क के कारण कई बार नवजात को पाचन संबंधी दिक्कतें भी सामने आती हैं। जिन बच्चों ने मां का दूध और फॉर्मूला मिल्क पीया उनमें विटामिन डी की कमी भी पाई गई।