पुतिन और बाइडेन के बीच वर्चुअल मीटिंग खत्म:रूस और यूक्रेन के बीच टकराव टालने पर रहा फोकस

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने मंगलवार को वर्चुअल मीटिंग की। दोनों नेताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए करीब दो घंटे तक चर्चा की। रूसी न्यूज एजेंसी तास के मुताबिक, शाम 6 बजकर 8 मिनट पर शुरू हुई मीटिंग 8 बज कर 10 मिनट तक चली।

दोनों नेताओं ने यूक्रेन समेत अफगानिस्तान के मुद्दों पर बातचीत की। अमेरिका चाहता है कि रूस किसी भी तरह से यूक्रेन पर हमला न करे। वहीं रूस भी नाटो के विस्तार को लेकर अमेरिका से ठोस आश्वासन चाहता है।

यह मीटिंग ऐसे वक्त में हुई जब पुतिन सरकार यूक्रेन पर हमलावर रुख अपना रही है। न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, रूस और यूक्रेन के बीच अमेरिका टकराव टालने की कोशिश कर रहा है। अगर रूस नहीं माना तो उस पर बाइडेन कड़े प्रतिबंध लगाने की तैयारी में हैं।इधर, तमाम इंटेलिजेंस इस बात की तरफ इशारा कर रही हैं कि रूस ने यूक्रेन को तीन तरफ से घेरना शुरू कर दिया है और माना जा रहा है कि उसकी सेनाएं किसी भी वक्त इस देश पर हमला कर सकती हैं। दूसरी तरफ, अमेरिका और नाटो कोशिश कर रहे हैं कि रूस इस मामले पर पीछे हट जाए। अमेरिका ने तो रूस को हमले के नतीजे भुगतने की वॉर्निंग भी दी है।

इधर, यूरोपीय यूनियन ने भी यूक्रेन पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने पर रूस को चेतावनी दी है। यूरोपीय संघ की प्रमुख वॉन डेर लेयेन ने कहा कि हम नहीं चाहते कि रूस कोई भी ऐसी कार्रवाई करे जिससे हमें कड़े फैसले लेने पर मजबूर होना पड़े।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और नाटो के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि रूसी सेनाएं किसी भी वक्त यूक्रेन पर हमला कर सकती हैं। अमेरिका और नाटो इसका जवाब देने की तैयारी कर रहे हैं। इन्होंने कहा है कि अगर रूस यूक्रेन पर हमला करता है तो उसे इंटरनेशनल फाइनेंशियल सिस्टम से बाहर कर दिया जाएगा। आज बाइडेन रूसी राष्ट्रपति को यह बता भी सकते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन और बाइडेन के बीच बातचीत के नतीजे का असर दुनिया पर जरूर पड़ेगा। आने वाले कुछ दिनों में इंटरनेशनल मार्केट्स और इकोनॉमी पर इस मुलाकात के नतीजे का साया दिखाई देगा।

अमेरिकी इंटेलिजेंस का मानना है कि रूस के एक लाख 75 हजार सैनिक यूक्रेन पर हमले के लिए हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं। 2014 में भी रूस ने यह कदम उठाया था। हालांकि, इस बात की कोई संभावना नहीं है कि बाइडेन अमेरिकी सैनिको को यूक्रेन की हिफाजत के लिए भेजेंगे।

इसे आप मोटे तौर पर इस तरह देख सकते हैं कि यूक्रेन सरकार रूस के बजाए यूरोप को ज्यादा अहमियत देती है। 2014 में जब राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने यूरोप के बजाए रूस को तरजीह दी तो जनता नाराज हो गई। इसका फायदा उठाकर रूस ने यूक्रेन का हिस्सा कहे जाने वाले क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। अब वो यूक्रेन को यूरोप, अमेरिका या कहें पश्चिमी देशों की तरफ जाने से रोकना चाहता है।

दरअसल, रूस को डर है कि अगर यूक्रेन और पश्चिमी देशों की रिश्ते मजबूत हुए तो भविष्य में नाटो सेनाएं रूस के करीब पहुंच जाएंगी और ये उसके लिए बड़ा खतरा होगा। यही वजह है कि वो यूक्रेन को ही अपने कब्जे में लेना चाहता है। अमेरिका और नाटो इसका विरोध करते हुए यूक्रेन के साथ खड़े हो गए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *