S-500 एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम जल्द ही भारत को मिल सकता है। यह दावा रूस के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर यूरी बोरिसोव ने किया है। इसे दावे को बहुत गंभीरता से इसलिए जा रहा है, क्योंकि वर्ल्ड मीडिया में कुछ महीने से यह खबर लगातार आ रही थी कि भारत और रूस के बीच सीक्रेट तौर पर S-500 डील पर बातचीत चल रही है। यह चर्चा तब और तेज हो गई जब इसी महीने की शुरुआत में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने भारत का दौरा किया। बहरहाल, अगर भारत S-500 खरीदता है तो उसे चीन पर बढ़त हासिल हो जाएगी, क्योंकि चीन के पास S-400 है और इसे भारत भी खरीद रहा है।सोमवार को मीडिया से बातचीत में बोरिसोव ने कहा- मुझे लगता है कि भारत S-500 का दुनिया में पहला खरीदार बन सकता है। इस बारे में किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। पहले हम अपने सेना को इस सिस्टम से लैस करना चाहते हैं। इसके बाद भारत ही हमारी पहली प्राथमिकता है। इस तरह का एंटी एयरक्राफ्ट और मिसाइल सिस्टम दुनिया में किसी और देश के पास नहीं है और यह कम्पलीट मिसाइल शील्ड है। फिलहाल, इसकी सप्लाई हमारी सेना को की जा रही है।
2019 में S-500 का फाइनल टेस्ट किया गया था। इसके बाद रूसी फौज के लिए इसका प्रोडक्शन शुरू हुआ। खास बात यह है कि तुर्की S-500 को खरीदने के लिए सबसे ज्यादा बेताब नजर आ रहा है, जबकि उसके पास पहले से ही S-400 है और इसकी खरीद के चलते अमेरिका ने उस पर कुछ प्रतिबंध भी लगाए हैं। इसके बावजूद वो S-500 पर नजरें जमाए है।
भारत को S-400 की डिलीवरी शुरू हो चुकी है। अमेरिका इससे नाराज है, हालांकि उसने भारत के खिलाफ अपने स्पेशल लॉ ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू संक्शन्स एक्ट’ (CAATSA) का इस्तेमाल नहीं किया। वहीं, तुर्की इसकी चपेट में आ गया है। भारत सुखोई एस-30 एयरक्राफ्ट, टी-30 टैंक्स और एके-203 सीरीज की राइफलें भी खरीद रहा है। इन्हें भारत में ही बनाया जाएगा।भारत और रूस सुपर एडवांस्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम S-500 या S-500 SAM पर क्यों कुछ नहीं बोल रहे हैं? यह सवाल पाकिस्तान की मीडिया में कई दिनों से उछाला जा रहा है, टीवी चैनलों पर डिबेट्स हो रही हैं। चीन में मीडिया सेंसरशिप के चलते वैसे ही कुछ भी बाहर आना मुमकिन नहीं है। अमेरिका ने S-400 पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी थी। अब तक इस पर फैसला नहीं हो सका है। सवाल ये है कि क्या S-500 पर भी वो चुप बैठेगा? क्या उसे भारत और रूस के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी नहीं है? क्या वो यह डील होने देगा? क्या इस डील से चीन और रूस के रिश्तों में दरार नहीं आएगी? क्या इस डील से एशिया में हथियारों की दौड़ का एक नया रास्ता और नहीं खुल जाएगा? इन सवालों के जवाब वक्त की गर्त में हैं। देखते हैं क्या होता है।