तालिबानी शासन वाले अफगानिस्तान में भारत के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की पहली यात्रा कई मायनों में दक्षिण एशिया की सियासत में मास्टर स्ट्रोक साबित होगी। पिछले 20 साल के दौरान भारत ने अफगानिस्तान में करीब 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया था। इसमें कई प्रोजेक्ट शामिल थे। करीब 5 हजार से ज्यादा भारतीय वहां इन प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे।
अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के बाद भारत ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था। अब भारत सरकार की ओर से तालिबान सरकार के साथ संबंधों को बढ़ाने के लिए फिलहाल मानवीय आधार पर अनाज और दवाएं भेजने की कूटनीति अपनाई है। इस दौरे का एक और पक्ष अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव को कम करना भी है। भारत विरोधी हक्कानी गुट तालिबान सरकार में कमजोर हो रहा है। भारत इस मौके का फायदा उठाकर अपने निवेश की सुध ले रहा है और जियो पॉलिटिक्स से पाकिस्तान को भी घेर रहा है।
अमेरिका और पश्चिमी देश भले ही तालिबान सरकार का बॉयकॉट करने के दावे कर रहे हैं, लेकिन वे जर्मनी और जापान के जरिए मानवीय आधार पर अफगानिस्तान सरकार को मदद दे रहे हैं। काबुल एयरपोर्ट का संचालन भी UAE कर रहा है। ऐसे में भारत ने भी बड़ा दांव खेला है।
भारत के लिए पॉजिटिव संकेत हैं कि वर्तमान तालिबान सरकार ने कश्मीर में आतंकवाद को कतई समर्थन नहीं देने का ऐलान किया है। साथ ही तहरीक-ए-तालिबान पाक सेना के खिलाफ ही मोर्चा खोले हुए है।