भाजपा-जेडीयू की दरार 389 दिन में खाई में बदल गई…। जाहिर है, नीतीश कुमार और बीजेपी की राहें अलग होने की स्क्रिप्ट एक सप्ताह या एक महीने में तैयार नहीं हुई है। बिहार विधानसभा चुनाव के रिजल्ट के बाद से ही नीतीश मौके की तलाश में थे। एनडीए में शामिल वीआईपी के सभी 3 विधायकों को तोड़कर भाजपा ने जब अपनी पार्टी में मिला लिया, तब से नीतीश और सजग हो गए। उन्हें समझ में आ गया कि भाजपा अपनी सहयोगी पार्टी को भी नहीं छोड़ेगी।
इसी बीच महाराष्ट्र में उद्धव सरकार का गिरना और RCP सिंह से बढ़ती बीजेपी की नजदीकियाें से नीतीश और डर गए। फिर उन्होंने खामोशी से अपनी राह पकड़ ली। भविष्य में किसी भी खतरे से निपटने के लिए उन्होंने पहले ही सब कदम उठा लिए।
विधानसभा में बीजेपी डेढ़ महीने पहले तक सबसे बड़ी पार्टी थी। उसने वीआईपी के तीनों विधायकों को शामिल कराया और राजद से यह तमगा छीन लिया। नीतीश को यहीं से चाल समझ में आ गई, उन्होंने विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को पीछे छोड़ने के लिए राजद में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के चार विधायकों को शामिल करा दिया। ऐसा करके नई सरकार का दावा करने के बीजेपी के मंसूबे पर पानी फिर गया। अक्सर होता यह है कि विपक्षी पार्टी के विधायक सरकार चला रही पार्टी में शामिल होते हैं, जबकि यहां उल्टा हुआ।
आरसीपी सिंह जदयू से दूर होकर बीजेपी की तरफ झुक गए। सबसे पहले नीतीश ने उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से हटाने के लिए राज्यसभा नहीं भेजा। इसी दौरान महाराष्ट्र में उद्धव सरकार के गिरने के तरीके से नीतीश और सजग हो गए। एकनाथ शिंदे की तर्ज पर आरसीपी सिंह बिहार में कैंप करके कुछ बड़ा करने की तैयारी में थे। यह भी बात आई कि वह जदयू के विधायकों को अपने पाले में करने में लगे हैं। यह भनक लगते ही नीतीश ने उनकी जांच कराई। पार्टी की तरफ से नोटिस देकर 9 साल में 58 प्लॉट खरीदने और उसमें हेराफेरी करने का जवाब मांग लिया। मजबूरन आरसीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा।बिहार में बीजेपी आरसीपी सिंह के साथ तेजी से सक्रिय हो गई थी। झारखंड कांग्रेस के तीन विधायक पश्चिम बंगाल में नोट के साथ पकड़े गए। नीतीश को डर था कि कहीं कांग्रेस के विधायक टूट कर भाजपा में न जा मिलें। इसलिए उन्होंने सोनिया गांधी को फोन करके सजग किया और महागठबंधन में शामिल होने को लेकर बात की।
विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 74 सीटें भाजपा ने जीती थीं। 43 सीटें नीतीश कुमार की पार्टी JDU को मिली थीं। फिर भी बीजेपी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाई, लेकिन डेढ़ साल में ही भाजपा को लगने लगा कि वह दूसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है। राज्य के नेताओं की सरकार और प्रशासन में सुनवाई नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार आरजेडी की इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी और उनकी पार्टी आरजेडी से बढ़ती नीतीश की नजदीकी से भाजपा डर गई। यहीं से भाजपा नेताओं ने सुशासन को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए गए। बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाने की तैयारी में जुट गई।
उधर, केंद्र में रामचंद्र सिंह (RCP) को भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने ज्यादा भाव देना शुरू कर दिया। RCP सिंह के सहारे भाजपा JDU के विधायकों को तोड़कर और कांग्रेस विधायकों के सहारे सरकार बनाने की अंदर ही अंदर तैयारी कर रही थी।बिहार विधानसभा चुनाव में JDU को सिर्फ 43 सीटें आईं, जबकि 2015 में उसे 71 सीटें मिली थीं। चुनाव के समय चिराग पासवान ने नारा दिया था- मोदी से बैर नहीं, नीतीश की खैर नहीं। लाेजपा ने JDU के प्रत्याशियों के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए। इससे कई जीतती सीटें भी नीतीश कुमार की पार्टी हार गई। नीतीश को रिजल्ट के बाद यह समझ में आ गया कि इसके पीछे बीजेपी थी। दो दिन पहले यह बात JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कही। उन्होंने कहा कि आरसीपी सिंह दूसरे चिराग पासवान बनने वाले थे। इसके पीछे कौन लोग हैं, समय आने पर इसका खुलासा किया जाएगा।