भारतीय विदेश मंत्रालय ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले देश के नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश (एडवाइजरी) जारी किया है। मंत्रालय ने यह कदम उन रिपोर्टों के बाद उठाया है जिसमें निजी टूर ऑपरेटरों के माध्यम से नेपाल पहुंचे कई भारतीय तीर्थयात्री चीनी वीजा और आवश्यक प्रवेश परमिट न होने के कारण वहां फंस गए थे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक यात्रा से जुड़े सभी वैध दस्तावेज न मिल जाएं, तब तक कोई भी नागरिक भारत से अपनी यात्रा की शुरुआत न करे।
हाल के दिनों में विदेश मंत्रालय को ऐसे कई भारतीय यात्रियों से मदद की गुहार मिली, जो बिना उचित कागजी कार्रवाई के यात्रा पर निकल गए थे। केवल उम्मीद के भरोसे या बिना पक्के दस्तावेजों के प्रस्थान करने से यात्रियों के बीच रास्ते में ही अटकने का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है। इसके साथ ही सरकार ने श्रद्धालुओं को सख्त हिदायत दी है कि वे केवल उन्हीं टूर ऑपरेटरों की सेवाएं लें जो पूरी तरह से पंजीकृत और अधिकृत हैं।
इस बीच, चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने एक वीडियो संदेश के जरिए तीर्थयात्रियों के लिए विशेष जानकारियां और अपना अनुभव साझा किया है। राजदूत और दूतावास के अधिकारियों ने स्वयं कैलाश पर्वत के परिक्रमा मार्ग और आधिकारिक प्रवेश बिंदुओं का जमीनी निरीक्षण किया है। उन्होंने बताया कि तिब्बती और चीनी कैलेंडर के अनुसार यह विशेष वर्ष हर 12 साल में एक बार आता है, जिसके कारण स्थानीय लोगों की भारी श्रद्धा और भीड़ वहां देखने को मिलेगी।
भारतीय दूतावास की टीम ने केवल प्रवेश मार्गों का ही जायजा नहीं लिया, बल्कि यात्रियों के ठहरने के लिए तय होटलों, रसोइयों, कमरों और उपलब्ध प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों का भी बारीकी से निरीक्षण किया है। राजदूत दोरईस्वामी के अनुसार, चीनी प्रशासन के सहयोग से सभी तैयारियां पुख्ता करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रद्धालुओं को इस दुर्गम यात्रा की प्राकृतिक और शारीरिक कठिनाइयों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
दूसरी ओर, उत्तराखंड के रास्ते आयोजित होने वाली पारंपरिक कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। इस वर्ष की यात्रा का शुभारंभ आगामी 4 जुलाई को उत्तराखंड में पहले जत्थे के आगमन के साथ होगा। इस बार लिपुलेख दर्रे के मार्ग से 50-50 श्रद्धालुओं के कुल 10 जत्थों को भेजने की योजना है। इस वर्ष तीर्थयात्रियों के लिए राहत की बात यह है कि बुनियादी ढांचे में सुधार के कारण उन्हें केवल 38 किलोमीटर की दूरी ही पैदल तय करनी होगी, जबकि शेष सफर वाहनों के जरिए पूरा किया जा सकेगा।