नई दिल्ली में मंगलवार को आयोजित उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में केंद्र सरकार ने धान की कटाई और रबी बुवाई के सीमित अंतर को देखते हुए राज्यों को पराली प्रबंधन के लिए त्वरित कार्रवाई करने के निर्देश दिए। कृषि भवन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की संयुक्त अध्यक्षता में हुई इस समीक्षा बैठक में खेतों में अवशेष जलाने की घटनाओं पर पूर्ण अंकुश लगाने, मशीनों के अधिकतम उपयोग तथा फसल अवशेषों से किसानों की आय बढ़ाने की रणनीतियों पर विस्तृत मंथन किया गया।
समीक्षा के दौरान कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि पराली की रोकथाम केवल अपीलों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए किसानों को किफायती, व्यावहारिक और सहज विकल्प उपलब्ध कराने होंगे। उन्होंने कहा कि फसल अवशेष जलाने से वायुमंडल प्रदूषित होने के साथ ही जमीन के जरूरी पोषक तत्व और मित्र कीट नष्ट होते हैं। इसके समाधान के रूप में अवशेषों को खेत में मिलाकर जैविक खाद तैयार करने अथवा उन्हें बाहर भेजकर बायो-सीएनजी, बायो-इथेनॉल, बिजली और पशु आहार में बदलने की व्यवस्था बनानी होगी। इसका मूल उद्देश्य ऐसी प्रणाली खड़ी करना है जिससे किसानों को आग लगाने की विवशता न रहे और उन्हें कार्बन क्रेडिट जैसी पहलों से अतिरिक्त आय प्राप्त हो सके।
बैठक में 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के आंकड़े साझा करते हुए बताया गया कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में हरियाणा में पराली की घटनाओं में 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि पंजाब में भी मामलों में कमी आई है। इसके विपरीत, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं में हुई बढ़ोतरी पर चिंता व्यक्त की गई। कृषि मंत्री ने इन दोनों राज्यों को चिह्नित संवेदनशील क्षेत्रों में फौरन विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए। साथ ही आगाह किया कि चूंकि कटाई का बड़ा चरण अभी बाकी है, इसलिए जिन राज्यों में सुधार दिखा है, वहां भी निगरानी में ढिलाई न बरती जाए।
मशीनरी की उपलब्धता पर बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केंद्र अब तक राज्यों को 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन उपकरण दे चुका है, जिनमें चालू वित्त वर्ष 2026-27 की 26,109 नई मशीनें शामिल हैं। उन्होंने केवल नई मशीनें बांटने के बजाय निष्क्रिय या खराब पड़ी पुरानी मशीनों की अविलंब मरम्मत करवाकर उन्हें खेतों में शत-प्रतिशत सक्रिय करने पर बल दिया। इसके अलावा, कस्टम हायरिंग केंद्रों के जरिए छोटे और सीमांत किसानों को रियायती दरों पर मशीनें मुहैया कराने के निर्देश दिए, ताकि साधनहीनता के चलते कोई किसान आग लगाने को बाध्य न हो।
वित्तीय सहायता के ब्योरे के अनुसार, केंद्र सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत वर्ष 2018-19 से 2025-26 के मध्य राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसमें से पंजाब को 2,056.50 करोड़ रुपये, हरियाणा को 1,171.71 करोड़ रुपये, उत्तर प्रदेश को 868.67 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश को 59 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित 592.57 करोड़ रुपये में से 430.87 करोड़ रुपये पहले ही दिए जा चुके हैं। धन के धीमे इस्तेमाल पर असंतोष जताते हुए चौहान ने पंजाब सरकार से पूर्व में जारी राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) शीघ्र भेजने को कहा, जिससे अगली किस्त जारी करने में रुकावट न आए।
इसके साथ ही लंबे चक्र वाली धान किस्म ‘पूसा-44’ के स्थान पर ‘पूसा 2090’ और ‘पीआर126’ जैसी कम अवधि में पकने वाली किस्मों को बढ़ावा देने और अवशेषों को थर्मल प्लांटों में पेलेट्स, जैव ईंधन तथा सूखे क्षेत्रों में चारे के रूप में भेजने पर सहमति बनी। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला, गुरदासपुर और हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, फतेहाबाद जिलों में विशेष निगरानी के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल उपग्रह आंकड़ों पर निर्भर न रहकर दोपहर 3 बजे के बाद सैटेलाइट कवरेज के अंतराल के दौरान उड़नदस्तों और जमीनी गश्त से सीधी निगरानी सुनिश्चित की जाए।