संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुरुवार को भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने सुरक्षा परिषद की वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि आठ दशक पुराने किसी युद्ध के नतीजे आज के विश्व की दशा और दिशा तय नहीं कर सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि अस्सी वर्ष पुरानी जीत के आधार पर मिली ताकत से आज की सुरक्षा परिषद की साख मजबूत नहीं हो सकती, क्योंकि मौजूदा ढांचा आज के वैश्विक यथार्थ का सही प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है।
भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता राष्ट्रों ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सीटों पर अपना नियंत्रण बना रखा है, जबकि उस संघर्ष में भारत की निर्णायक भूमिका को भुला दिया गया। उन्होंने रेखांकित किया कि उस युद्ध में लगभग 25 लाख भारतीय सैनिकों ने भागीदारी की थी, जिनमें से करीब 90 हजार जवानों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे।
उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि तत्कालीन औपनिवेशिक युद्ध नीतियों के परिणामस्वरूप बंगाल के भीषण अकाल में 40 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई थी। कुछ ताकतें इस ऐतिहासिक सच्चाई को दबाने अथवा अनदेखा करने की कोशिश करती रही हैं। पी. हरीश ने कहा कि यह संस्था पूरी तरह विजेताओं द्वारा, उन्हीं के हितों और उन्हीं के हाथों रची गई थी, जिसमें स्वाभाविक रूप से पीड़ितों के सरोकारों और पीड़ा की परवाह नहीं की गई।
इसके साथ ही भारत ने 1945 के चार्टर में विजेताओं को मिले उन विशेषाधिकारों पर भी सवाल उठाए, जिनका सहारा लेकर कुछ देश सुधारों में अड़ंगा लगा रहे हैं। भारतीय राजदूत ने आगाह किया कि इन विशेषाधिकारों का उपयोग अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) को अनिश्चित काल तक बाधित रखने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जैसे कि वार्ता के लिए किसी तय दस्तावेज, निश्चित समय-सीमा अथवा स्पष्ट दिशा को रोक देना।
इस दौरान भारत ने इटली के नेतृत्व वाले ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (यूएफसी) समूह की कार्यप्रणाली की आलोचना की, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह यह तर्क देकर सुधार से जुड़े आवश्यक दस्तावेज को अपनाने से रोकता रहा है कि पहले पूर्ण आम सहमति बनाई जाए।
भारतीय प्रतिनिधि ने इस कार्यशैली को पूरी तरह तर्कहीन करार देते हुए कहा कि किसी भी बहुपक्षीय व्यवस्था में वार्ता शुरू करने के लिए दस्तावेज पहली शर्त होता है, न कि पूरी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम। उन्होंने जोर देकर कहा कि आईजीएन की कार्यप्रणाली संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रक्रियाओं से भिन्न नहीं हो सकती, जहां बातचीत किसी ठोस पाठ्य सामग्री के आधार पर ही आगे बढ़ती है।