ट्रंप प्रशासन के रूसी ईंधन समझौते के विरोध में अमेरिकी सांसदों ने लाया नया कानून

ट्रंप प्रशासन के रूसी ईंधन समझौते के विरोध में अमेरिकी सांसदों ने लाया नया कानून

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से रूसी डीजल आयात को दी गई कानूनी छूट को निरस्त करने के लिए दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सांसदों ने संसद में एक नया विधेयक प्रस्तुत किया है। सांसदों ने इस प्रशासनिक कदम को 2022 के उस कानून का सीधा उल्लंघन बताया है जिसके तहत रूस से पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर कानूनी पाबंदी लगाई गई थी।

‘रॉनल्ड रीगन पीस थ्रू स्ट्रेंथ एक्ट’ नामक यह विधेयक बीते सप्ताह डेमोक्रेटिक सांसद मैरी ग्लूसेनकैंप पेरेज तथा रिपब्लिकन सांसद ब्रायन फिट्जपैट्रिक और डॉन बेकन द्वारा पेश किया गया, जिसकी पुष्टि बुधवार को सांसद पेरेज के कार्यालय ने की।

इस विधायी मसौदे का केंद्रीय उद्देश्य अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा रूसी तेल आयात को दी गई छूट को तत्काल समाप्त करना है। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो ‘जनरल लाइसेंस 135’ का प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाएगा और आगामी समय में भी रूसी ऊर्जा उत्पादों के आयात के लिए ऐसे किसी भी प्रकार के लाइसेंस अथवा छूट जारी करने पर स्थायी रोक लग जाएगी।

विधेयक के अन्य प्रावधानों के तहत वित्त विभाग को ऐसे किसी भी लेन-देन पर सार्वजनिक धन खर्च करने से रोका गया है जो 2022 के प्रतिबंध कानून का उल्लंघन करता हो। इसके अलावा, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के लिए यह अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है कि वे यूक्रेन की रक्षा में सहायता जारी रखें और किसी भी अवरोध की स्थिति में एक दिन के भीतर संसद की खुफिया समितियों को रिपोर्ट सौंपें।

सांसदों ने प्रशासन के इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पेरेज ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति का यह कदम अमेरिकी राष्ट्रीय हितों और द्विदलीय विधायी सहमति के खिलाफ है; ईंधन की दरें नियंत्रित करने के लिए ईरान में शांति बहाली पर काम होना चाहिए, न कि करदाताओं के धन को रूस तक पहुंचाया जाए। सांसद फिट्जपैट्रिक का कहना था कि देश को रूसी तेल से पूरी तरह दूरी बनाए रखनी चाहिए और व्यापक संसदीय समर्थन से पारित 2022 के कानून की गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। सांसद बेकन ने भी ट्रंप के विरोधाभासी रुख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यूरोपीय देशों की ऊर्जा खरीद की आलोचना करने वाले नेतृत्व के तहत अब रूसी डीजल व्यापार को बढ़ावा मिल रहा है।

पश्चिम एशिया में जारी अशांति के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के बीच प्रशासन ने यह निर्णय लिया था, जिस पर रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने भी 2022 के कानून के उल्लंघन की आशंका जताई थी। जानकारों के अनुसार, यह विवाद भारत-अमेरिका कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से भी संवेदनशील है। भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद पर अमेरिका लगातार आपत्ति जताता रहा है, जबकि भारत पश्चिमी मुल्कों के इस दोहरे रवैये पर खुलकर ऐतराज जताता आया है।

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