यूक्रेन विवाद:जंग की आशंका जरूर बहुत ज्यादा है

यूक्रेन विवाद:जंग की आशंका जरूर बहुत ज्यादा है

रूस की सेनाएं यूक्रेन को तीन तरफ से घेर चुकी हैं। वॉशिंगटन और ब्रसेल्स से व्लामिदिर पुतिन को प्रतिबंधों की धमकियां दी जा रही हैं। कीव से अमेरिका और रूस दोनों अपने डिप्लोमैट्स की फैमिली को मुल्क वापस भेज चुके हैं। इसके बावजूद कूटनीति यानी डिप्लोमैसी मौजूद है और इसके जरिए जंग से बचा जा सकता है, इस मसले का हल निकाला जा सकता है। नाटो और जो बाइडेन ने रूस को जंग टालने के लिए लिखित प्रस्ताव दिया है और रूस उस पर विचार कर रहा है।

सवाल ये है कि क्या इस मामले में कोई समझौता हो पाएगा। रूस सबसे बड़ी शर्त है कि नाटो ये वादा करे कि वो यूक्रेन में दाखिल नहीं होगा। दरअसल, रूस चाहता है कि 1990 में उसका जो दबदबा इस रीजन में था, वो बना रहे। पुतिन कभी नहीं चाहेंगे कि उनका पड़ोसी किसी भी सूरत में पश्चिमी देशों यानी अमेरिका और नाटो का साथी बने या नाटो में शामिल हो। रूस के लोगों में भी यही भावना है। 2014 में रूस क्रीमिया पर कब्जा कर चुका है। अमेरिका भी रूस की ताकत से वाकिफ है। यह एक तरह से नए कोल्ड वॉर की शुरुआत है। दोनों देश एटमी ताकत हैं और शायद ये जाहिर करना चाहते हैं कि ताकत के बल पर कौन बढ़त ले सकता है।

हालात खराब होने या कहें जंग से अब भी बचा जा सकता है। दिक्कत ये है कि पुतिन के एडवाइजर्स भी ये नहीं जानते कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। पुतिन ये मानने को शायद तैयार नहीं हैं कि यूक्रेन अब अलग देश है। पुतिन मानते हैं कि सोवियत संघ का टूटना एक गलती थी और अब उसे दुरुस्त करना चाहिए। इसके लिए वो जंग के लिए भी तैयार हैं। सवाल ये भी है कि अगर जंग होती है तो वो कब तक चलेगी, क्या कुछ हफ्ते? कहा जा रहा है कि चीन में अगले महीने होने वाले विंटर ओलिंपिक्स तक पुतिन जंग नहीं छेड़ेंगे। इसकी वजह यह है कि वो अपने दोस्त शी जिनपिंग को नाराज नहीं करना चाहते। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने रविवार को कहा था- बातचीत या डिप्लोमैसी को हमारी कमजोरी नहीं समझना चाहिए।हो सकता है कि पुतिन को यह गलतफहमी हो कि यूक्रेन अगर नाटो में शामिल हो जाएगा तो अमेरिका ज्यादा ताकतवर होकर रूस की दहलीज तक पहुंच जाएगा। लगता तो यह है कि अमेरिका और नाटो दोनों का ऐसा कोई इरादा नहीं है। अमेरिका कह रहा है कि अगर कोई देश नाटो में शामिल होना चाहता है तो वो उसे रोकेगा नहीं। हालांकि, यूक्रेन में बहुत करप्शन है और ऐसा लगता नहीं कि वो अगले 20 साल में भी कभी नाटो में शामिल हो पाएगा। और फिर, बाइडेन खुद कह चुके हैं कि यूक्रेन का नाटो में शामिल होना फिलहाल मुमकिन नहीं है। इसका मतलब है कि रूस की आशंका ही गलत है और फिर बातचीत से समाधान क्यों नहीं निकाला जा सकता?

पुतिन को ऐसा लगता है कि अमेरिका अब यूक्रेन में अपने एटमी हथियार तैनात करना चाहता है। जबकि व्हाइट हाउस कई बार कह चुका है कि उसका ऐसा कोई प्लान नहीं है। इस मामले पर भी बातचीत से समझौता हो सकता है। 1997 में रूस के तब के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और उनके अमेरिकी काउंटर पार्ट बिल क्लिंटन के बीच एक समझौता हुआ था। इसमें कहा गया था कि यूरोप, सोवियत संघ से अलग हुए देश और वारसा देश अगर चाहें तो वो नाटो में शामिल हो सकते हैं। पुतिन चाहते हैं कि यूरोप में कोई भी एटमी हथियार तैनात न किया जाए। जबकि जर्मनी, तुर्की, इटली और बेल्जयम के पास तो कई साल से यह हथियार मौजूद हैं।इंटरनेशनल न्यूक्लियर ट्रीटी में अहम भूमिका निभाने वाली मारिया गोटेमोएलर कहती हैं- बाइडेन और पुतिन बैठकर तमाम मुद्दों का हल निकाल सकते हैं। इससे यूरोप का फ्यूचर बेहतर हो जाएगा। एटमी मुद्दा भी सुलझाया जा सकता है। अमेरिका तो कह ही रहा है कि 1997 का समझौता लागू करना चाहिए। पुतिन को भी हकीकत समझनी चाहिए। पूर्व डिप्लोमैट थॉमस पिकरिंग कहते हैं- डर इस बात का है कि अगर ये जंग एक बार शुरू हो गई तो फिर कहां जाकर थमेगी? ये कहा नहीं जा सकता।

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