छत्तीसगढ़ के चार वन अफसरों के खिलाफ केस दर्ज करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर अफसरों ने दो वन भैंसों को लाकर बंधक बनाया। मामले में दोषी अफसरों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति देने की मांग की गई है। हाईकोर्ट के जस्टिस आसीएस सामंत की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
रायपुर के ब्यास मुनि दिवेदी ने हाईकोर्ट में याचिका कर बताया है कि छत्तीसगढ़ वन विभाग ने असम के मानस नेशनल पार्क से एक नर और एक मादा के साथ दो वन भैंसों को पकड़ कर लाया गया, जिसके लिए पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार ने सशर्त अनुमति दी थी। इसमें वन भैसों को समुचित रूप से जंगल में छोड़ना था, लेकिन अफसरों ने दोनों वन भैसों को छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभ्यारण के बाड़े में बंधक बना रख लिया है।
याचिका में बताया गया है कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रावधान के तहत किसी भी वन्य प्राणी को इस तरह से बंधक बनाकर रखना अपराध है। ऐसे केस में कम से कम 3 साल से लेकर 7 साल तक सजा का प्रावधान है। वन भैंसा, बाघ के समान ही अनुसूची-एक का वन्य प्राणी है। इनको तब तक बंधक नहीं बनाया जा सकता जब तक कि यह सुनिश्चित नहीं हो जाए कि उन को पुनर्वासित नहीं किया जा सकता। जैसे की बाघ के मामले में ऐसी चोट लगने से जो ठीक न हो सके, जिस से वह शिकार न कर सके।
याचिका में बताया गया है कि वन भैंसों को असम से छत्तीसगढ़ लाने के लिए चार IFS जिम्मेदार हैं, इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन की अनुमति पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ही दे सकता है। लिहाजा, अभियोजन के लिए उन्होंने सितंबर 2021 में मंत्रालय से अनुमति देने की मांग की थी। इसके बाद कई रिमाइंडर भी भेजे गए। लेकिन, मंत्रालय की ओर से अब तक कोई कार्रवाई नहीं किए जाने पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में अभियोजन की अनुमति के लिए मंत्रालय को आदेशित करने की मांग की गई है। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र शासन से जवाब मांगा है।छत्तीसगढ़ वन विभाग वर्तमान में पदस्थ IFS प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य-प्राणी) पीवी नरसिम्ह राव और तत्कालीन IFS अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य-प्राणी) वर्तमान में सदस्य सचिव बायो-डाइवर्सिटी बोर्ड अरुण कुमार पांडेय के कार्यकाल में अप्रैल 2021 में असम से वन भैंसा लेकर आया गया। आरोप है कि उन्हें बारनवापारा अभयारण्य के बाड़े में कैद कर रखा गया है। पूर्व में पदस्थ सेवानिवृत्त IFS प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य-प्राणी) कौशलेंद्र कुमार सिंह ने प्लान बनाया था कि असम से पांच “मादा” वन भैंसों को पकड़ कर लाया जाएगा और यहां पर बंधक बनाकर उनसे प्रजनन कराया जाएगा, जो वन भैंसे पैदा होंगे उनको वन में छोड़ा जाएगा। वन अधिकारी असम के वन भैंसों का उदंती सीता नदी अभयारण्य में रखे गए वन भैसों से मेल करा कर नई जीन पूल तैयार करना चाहते थे। इनके खिलाफ अभियोजन के लिए अनुमति मांगी गई है।
याचिकाकर्ता ने बताया कि देश के प्रतिष्ठित संस्थान वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया असम से वन भैंसा छत्तीसगढ़ लाने के विरुद्ध रहा है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अनुसार छत्तीसगढ़ के वन भैंसों का जीन पूल पूरे विश्व में सबसे यूनीक है। इसलिए दो जीन पूल यानी छत्तीसगढ़ और असम के वन भैंसों का जीन पूल को नहीं मिलाना चाहिए।
दिवेदी ने बताया कि वन विभाग के दस्तावेज से स्पष्ट है कि असम के मानस नेशनल पार्क से लाए गए दो वन भैंसों को आजीवन बाड़े में कैद कर प्रजनन कराने की योजना है। वन विभाग चार मादा वन भैंसों को असम से और लाने वाला है और इन सभी वन भैंसों को और इन से पैदा हुए वन भैसों को आजीवन कैद में रहना होगा। इन्हें वन में छोड़ने का कोई भी प्लान वन विभाग के पास नहीं है। द्विवेदी ने बताया कि अभियोजन की अनुमति मिलने उपरांत उनके द्वारा दोषियों को सजा दिलाने के लिए वाद दायर किया जाएगा।