भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्वदेशी तकनीक पर आधारित धनुष आर्टिलरी गन सिस्टम की खरीद को मंजूरी दे दी गई है। शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकृति मिली। इस बैठक में थलसेना के लिए कई अहम निर्णय लिए गए, जिनमें 300 स्वदेशी आर्टिलरी गन सिस्टम की खरीद भी शामिल है।
इस खरीद प्रक्रिया के पूरी होने के बाद भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इसके तहत सेना में 15 से अधिक नई रेजिमेंट शामिल हो जाएंगी। वर्तमान में लगभग 3 रेजिमेंट पहले ही शामिल हो चुकी हैं, जबकि 3 अन्य रेजिमेंट निकट भविष्य में सेना का हिस्सा बनने वाली हैं।
धनुष गन सिस्टम को ‘देसी बोफोर्स’ के नाम से भी जाना जाता है। यह 155 मिमी, 45 कैलिबर की तोप है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 40 किलोमीटर तक है। यह दूरी पारंपरिक बोफोर्स तोप की 27 किलोमीटर की रेंज से अधिक है। इस आधुनिक तोप का निर्माण गन कैरिज फैक्ट्री द्वारा किया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इसकी तैनाती की गई थी और इसका सफल उपयोग किया गया था।
भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की योजना वर्ष 1999 में शुरू हुई थी, जिसमें आर्टिलरी को एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया गया। इस योजना के तहत वर्ष 2027 तक कुल 2800 तोपों को सेना में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत 155 मिमी की विभिन्न कैलिबर की तोपों की खरीद की जा रही है और इस दिशा में तेजी से काम चल रहा है।
इस व्यापक योजना में विभिन्न प्रकार की तोपें शामिल हैं, जैसे टोड गन (जिन्हें वाहनों के जरिए खींचा जाता है), ट्रक-माउंटेड गन (जो वाहनों पर लगी होती हैं), ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड और व्हील्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड गन, साथ ही अल्ट्रा-लाइट होवित्जर तोपें। इन अल्ट्रा-लाइट तोपों की खासियत यह है कि इन्हें हेलीकॉप्टर के माध्यम से उन दुर्गम पहाड़ी इलाकों में भी पहुंचाया जा सकता है, जहां सड़क मार्ग से पहुंचना कठिन होता है।
अब तक इस योजना के तहत 145 एम-777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर तोपें सेना में शामिल की जा चुकी हैं। इसके अलावा 100 ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड गन के-9 वज्र भी भारतीय सेना का हिस्सा बन चुकी हैं। इस प्रकार, स्वदेशी तकनीक और आधुनिक हथियारों के जरिए सेना की ताकत को लगातार मजबूत किया जा रहा है।