हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी: ट्रंप के कड़े रुख से ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के पार

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी: ट्रंप के कड़े रुख से ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के पार

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में गुरुवार को जबरदस्त उछाल देखने को मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान की घेराबंदी तेज करने के बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि जब तक ईरान के साथ कोई ठोस समझौता नहीं हो जाता, तब तक सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी प्रभावी रहेगी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक हालिया साक्षात्कार में अपनी रणनीति साझा करते हुए कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम कसने के लिए यह नाकेबंदी सबसे प्रभावशाली हथियार है। उनके अनुसार, यह आर्थिक दबाव किसी भी सीधी सैन्य कार्रवाई की तुलना में अधिक परिणामकारक सिद्ध हो रहा है और इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर निरंतर बोझ बढ़ रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के उस हालिया प्रस्ताव को भी सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें नाकेबंदी हटाने के बदले वार्ता की मेज पर आने की बात कही गई थी। अमेरिका का रुख स्पष्ट है कि किसी भी रियायत से पहले ईरान को वाशिंगटन की सभी शर्तों को बिना किसी संकोच के स्वीकार करना होगा।

हालांकि राष्ट्रपति ने कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी है, लेकिन उन्होंने यह संकेत भी दिया कि यदि बातचीत के जरिए कोई रास्ता नहीं निकलता है, तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा। इस बढ़ते तनाव ने दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा आपूर्ति मार्ग ‘हॉर्मुज़’ को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि वैश्विक तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यहाँ होने वाली किसी भी प्रकार की बाधा सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों को अनियंत्रित कर सकती है।

इस गंभीर स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने चेतावनी जारी की है। सैक्स का मानना है कि वर्तमान संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि तेल आपूर्ति में आने वाली कोई भी रुकावट कीमतों को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी, जिससे कई विकसित और विकासशील देशों में आर्थिक अस्थिरता का खतरा पैदा हो जाएगा। उनके अनुसार, ऊर्जा बाजार का संतुलन इस समय अत्यंत नाजुक दौर में है और यदि शीघ्र ही कोई समाधान नहीं खोजा गया, तो इसका दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था पर पड़ेगा।

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