भारतीय सैन्य इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को आज एक वर्ष पूरा हो गया है। 7 मई को इस अभियान की पहली वर्षगांठ के मौके पर भारतीय सेना ने उन वीर जांबाजों को नमन किया है, जिन्होंने पाकिस्तान और पीओके में छिपे आतंकियों के विरुद्ध इस साहसिक मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। यह ऑपरेशन भारत की सैन्य क्षमता और आतंकवाद के खिलाफ उसकी आक्रामक रणनीति का प्रतीक बनकर उभरा है।
इस सैन्य कार्रवाई की पृष्ठभूमि पिछले साल पहलगाम में हुए उस दर्दनाक नरसंहार से जुड़ी है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने निर्दोष लोगों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा था। इस हमले की जिम्मेदारी ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने ली थी। सेना ने इस अपमान का बदला लेने के लिए ठीक दो सप्ताह बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की शुरुआत की, जिसमें आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया गया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर भारतीय सेना ने इस उपलब्धि को याद करते हुए लिखा कि भारत की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय गरिमा के अनुरूप और बेहद प्रभावशाली थी। सेना के अनुसार, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह सिद्ध कर दिया कि न्याय की राह में कोई भी बाधा भारत को नहीं रोक सकती। मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ ने भी इस अभियान को देश की इच्छाशक्ति का प्रतिबिंब बताया है।
सेना द्वारा जारी वृत्तचित्र (वीडियो) में अभियान की पूरी यात्रा को दर्शाया गया है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन शब्दों को शामिल किया गया है, जिन्होंने उस समय शोक संतप्त राष्ट्र में जोश भर दिया था। प्रधानमंत्री ने आतंकवादियों के मददगारों को आगाह करते हुए कहा था कि भारत सरकार अपराधियों को पाताल से भी खोज निकालेगी। उन्होंने वैश्विक मंच पर यह साफ कर दिया था कि जब तक आतंक की फैक्ट्री बंद नहीं होती, तब तक सामान्य संबंधों की बात नहीं की जा सकती।
वीडियो में प्रधानमंत्री के उस कूटनीतिक प्रहार को भी दिखाया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि आतंकवाद और व्यापारिक संबंध एक पटरी पर नहीं चल सकते। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में संदेश दिया था कि शत्रु को खून और पानी एक साथ बहाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह बयान भारत की उस बदली हुई रणनीति का हिस्सा था, जिसमें केवल रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई।
पहलगाम की उस काली घटना का विवरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह आतंकियों ने धर्म के आधार पर लोगों को अलग किया और जबरन धार्मिक पाठ पढ़वाने के बाद गोलियां चलाईं। उस हमले में जान गंवाने वाले 26 लोगों में एक वह साहसी स्थानीय टट्टू-चालक भी था, जिसने पर्यटकों को बचाने का प्रयास किया था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से भारतीय सेना ने इन सभी निर्दोषों की शहादत का हिसाब बराबर किया।