मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक संपदा को सहेजने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि राज्य सरकार प्राचीन ज्ञान, कला और सभ्यता के प्रतीकों के संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रही है। सरकार के “विरासत भी-विकास भी” संकल्प के तहत ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण को पर्यटन विकास से जोड़ा जा रहा है। डॉ. यादव ने बताया कि प्रदेश में बिखरे हुए मंदिर अवशेषों को वैज्ञानिक विधि से पुनर्स्थापित करने का एक वृहद अभियान चलाया जा रहा है, जो नई पीढ़ी में अपनी विरासत के प्रति गर्व की अनुभूति कराएगा।
पुरातत्व संचालनालय द्वारा अपनाई जा रही ‘एनास्टाइलोसिस’ और ‘पुनर्संरचना’ जैसी तकनीकें इस अभियान का मुख्य आधार हैं। इनके माध्यम से खंडित प्रतिमाओं और मंदिर के हिस्सों को उनके वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप में पुनर्स्थापित किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में प्राचीनता और मौलिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि इतिहास के साथ कोई छेड़छाड़ न हो।
इस परियोजना के सफल कार्यान्वयन की बानगी सीहोर और रायसेन जिलों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सीहोर के देवबड़ला में घने जंगलों के बीच स्थित 11वीं सदी के परमारकालीन मंदिरों का वैभव फिर से लौट रहा है। यहाँ ‘भूमिज शैली’ के स्थापत्य को संरक्षित करने के लिए उन्हीं मूल पत्थरों का उपयोग किया गया है जो उत्खनन में प्राप्त हुए थे। वहीं, रायसेन के आशापुरी में प्रतिहारकालीन स्थापत्य को सहेजने का कार्य अंतिम चरणों में है, जहाँ गजासुर संहारक शिव जैसी उत्कृष्ट प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।
राज्य व्यापी इस पहल के तहत खंडवा (ओंकारेश्वर) के सिद्धेश्वर मंदिर समूह और उज्जैन के महाकाल मंदिर क्षेत्र में भी विशेष संरक्षण कार्य किए जा रहे हैं। रायसेन के धवला क्षेत्र में भी संरचनात्मक मजबूती और सफाई के माध्यम से मंदिरों को सुरक्षित किया गया है। इन समेकित प्रयासों का उद्देश्य केवल भवनों का जीर्णोद्धार करना नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करना है।
मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में संचालित यह अभियान प्राचीन विरासत को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ने का कार्य कर रहा है। गौरवशाली अतीत और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का यह संगम न केवल पर्यटन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा, बल्कि मध्य प्रदेश को सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े एक आधुनिक राज्य के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थापित करेगा।