विश्व बैंक द्वारा गुरुवार को जारी की गई ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का अपना दर्जा बरकरार रखेगा। वाशिंगटन स्थित इस वैश्विक वित्तीय संस्थान ने अपने नवीनतम ‘ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्टस’ में मजबूत घरेलू मांग के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास अनुमानों में महत्वपूर्ण वृद्धि की है। नए आंकड़ों के तहत वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही वर्ष 2027 के लिए आर्थिक वृद्धि दर के लक्ष्य को पूर्व के 6.6 प्रतिशत से काफी ऊपर ले जाते हुए 7.2 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।
इस सकारात्मक बदलाव के पीछे देश के भीतर उम्मीद से कहीं अधिक मजबूत रही आंतरिक मांग और आर्थिक बुनियादी ढांचे की मजबूती को मुख्य कारण माना गया है। वर्ल्ड बैंक के डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट आयहान कोसे ने मीडिया के साथ बातचीत के दौरान पुष्टि की कि वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भी भारत की आर्थिक रफ़्तार दुनिया में सबसे आगे रहेगी। एक समाचार एजेंसी के सवाल का जवाब देते हुए कोसे ने स्पष्ट किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की यह तीव्र गति घरेलू मोर्चे पर आए उछाल को दर्शाती है, जिसने मध्य पूर्व के संघर्ष से उत्पन्न हुए नकारात्मक प्रभावों को पूरी तरह बेअसर कर दिया है।
रिपोर्ट के विश्लेषण से यह भी सामने आया है कि भारत के शानदार प्रदर्शन के बल पर दक्षिण एशिया विश्व का सबसे गतिशील आर्थिक क्षेत्र बना रहेगा। हालांकि, ऊर्जा की आसमान छूती कीमतों और युद्ध के व्यापक असर के चलते इस पूरे क्षेत्र की सामूहिक विकास दर वर्ष 2025 में 7 प्रतिशत से गिरकर 6.3 प्रतिशत रहने की आशंका है। इसके विपरीत, भारतीय संदर्भ में बात करते हुए कोसे ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितताओं के बाद भी देश के आर्थिक आधार अडिग हैं। उन्होंने भारत सरकार द्वारा किए गए नीतिगत सुधारों की सराहना करते हुए कहा कि जब हम भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर को देखते हैं, तो उसमें एक जबरदस्त निरंतरता और मजबूती साफ दिखाई देती है।
दूसरी तरफ, वैश्विक परिदृश्य को लेकर विश्व बैंक ने एक गंभीर चेतावनी भी जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व संकट के नकारात्मक असर के कारण वर्ष 2026 में पूरी दुनिया की विकास दर घटकर 2.5 प्रतिशत पर आ सकती है, जो कि वर्ष 2025 में 2.9 प्रतिशत थी। कोरोना महामारी के शुरुआती दौर के बाद से यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे सुस्त रफ्तार होगी। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, अनियंत्रित होती महंगाई और दुनिया भर में कड़े होते वित्तीय नियम हैं, जिससे अधिकांश देशों की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
इन तमाम वैश्विक विसंगतियों के बीच भी भारत उन चुनिंदा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जिसके रेटिंग आउटलुक में सुधार दर्ज किया गया है। डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट ने इस संबंध में बताया कि घरेलू मांग के साथ-साथ देश के निर्यात (एक्सपोर्ट) क्षेत्र में आई तेजी ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई है। इसी मजबूत आंतरिक और बाहरी व्यापारिक गतिविधियों के कारण बैंक को अपने पुराने अनुमानों में संशोधन करना पड़ा है।
रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्षों में कहा गया है कि भारत की इस निरंतर प्रगति के सहारे दक्षिण एशियाई क्षेत्र वैश्विक पटल पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला रीजन बना रहेगा। वर्तमान सुस्ती के दौर से उबरते हुए वर्ष 2027 में इस क्षेत्र की सामूहिक विकास दर 6.9 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, अगर भारत की बात करें तो दीर्घकालिक अनुमानों के तहत वर्ष 2028 में देश की आर्थिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत के मजबूत स्तर पर रहने की संभावना जताई गई है।