मध्य प्रदेश के राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को पूरा करने में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कुलपतियों और शिक्षण संस्थानों को छात्र-छात्राओं के लिए ऐसे अधिक से अधिक मंच और अवसर तैयार करने चाहिए, जिससे वे इस राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बन सकें। राज्यपाल लोकभवन में आयोजित विश्वविद्यालय समन्वय समिति की 102वीं बैठक को संबोधित कर रहे थे, जहां शासकीय और निजी विश्वविद्यालयों के कामकाज, प्रबंधन और आपसी समन्वय से जुड़े कई अहम मुद्दों की समीक्षा की गई।
बैठक के दौरान राज्यपाल ने उच्च शिक्षा और छात्र कल्याण को लेकर कई व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने कुलपतियों से कहा कि प्रत्येक दो वर्ष में अपने संस्थान के पूर्व छात्रों (एलुमनाई) के लिए एक विशेष प्लेसमेंट सम्मेलन आयोजित करें। इस पहल से न केवल विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ेगी, बल्कि वर्तमान में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को करियर के मोर्चे पर सही मार्गदर्शन और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिल सकेगी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की वैश्विक सफलता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के करीब 200 देशों ने योग को अपनाया है। ऐसे में विश्वविद्यालयों को अपने यहाँ, विशेषकर छात्रावासों से शुरुआत करते हुए योग को साप्ताहिक या मासिक स्तर पर एक नियमित गतिविधि के रूप में स्थापित करना चाहिए।
शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति की आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ते हुए श्री मंगुभाई पटेल ने रोजगारपरक सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स शुरू करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ये पाठ्यक्रम गरीब और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले परिवारों को संबल देने का एक व्यावहारिक माध्यम हैं। इसके साथ ही उन्होंने कृषि से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के लिए भी एक ठोस प्रमाणीकरण (सर्टिफिकेशन) व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया। राज्यपाल ने कुलपतियों और प्राध्यापकों को उनके नैतिक दायित्वों की याद दिलाते हुए कहा कि माता-पिता एक गहरे भरोसे के साथ अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए भेजते हैं, और इस विश्वास को बनाए रखना शैक्षणिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है।
विद्यार्थियों में सामाजिक संवेदनशीलता जगाने की वकालत करते हुए राज्यपाल ने कहा कि केवल किताबी ज्ञान और कौशल काफी नहीं है, छात्रों का समाज से जुड़ना भी जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों को गोद लें और वहां विकास कार्यों में छात्रों को शामिल करें। केंद्र सरकार की ‘पीएम-जनमन’ और ‘धरती आबा ग्राम उत्कर्ष योजना’ जैसी महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए विद्यार्थियों को गांवों का भ्रमण कराया जाए। इस तरह के जमीनी अनुभव भावी पीढ़ी को समाज के पिछड़े और गरीब वर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाएंगे।
इसी बैठक में प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री श्री इंदर सिंह परमार ने कुलपतियों को कड़ा संदेश देते हुए विश्वविद्यालयों के वित्तीय अनुशासन पर विशेष ध्यान देने को कहा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वित्तीय नियमों और दिशा-निर्देशों की अनदेखी को गंभीर गड़बड़ी माना जाएगा, इसलिए सभी कुलपतियों को तय वित्तीय सीमाओं का पूरी कड़ाई से पालन करना होगा। निजी विश्वविद्यालयों के प्रवेश नियमों पर बात करते हुए मंत्री ने साफ किया कि कॉमन पोर्टल के जरिए एकीकृत ई-प्रवेश प्रक्रिया अपनाना उनके लिए स्वैच्छिक है, लेकिन किस छात्र ने प्रवेश लिया है, इसकी जानकारी रेगुलेटरी कमीशन (आयोग) के पोर्टल पर स्वचालित (ऑटोमेटेड) तरीके से दर्ज होने की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू होनी चाहिए।
समन्वय समिति की इस 102वीं बैठक में उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री अनुपम राजन, राज्यपाल के प्रमुख सचिव डॉ. नवनीत मोहन कोठारी, उच्च शिक्षा आयुक्त श्री प्रबल सिपाहा और राज्यपाल के उप सचिव श्री सुनील दुबे मौजूद थे। इनके साथ ही राज्य के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के कुलपति तथा राजभवन और उच्च शिक्षा विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी भी विचार-विमर्श में शामिल हुए।