केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने गुरुवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘फर्स्ट ग्लोबल ड्रग रेगुलेटरी कॉन्क्लेव 2026’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य विश्व भर के नियामक संस्थानों को एक मंच पर लाकर दवाओं और मेडिकल उपकरणों की सुरक्षा, गुणवत्ता तथा नवाचार के लिए नए वैश्विक मानक स्थापित करना है।
उद्घाटन सत्र में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक विश्वसनीय, पारदर्शी और विज्ञान पर आधारित रेगुलेटरी सिस्टम बेहद आवश्यक है। भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि देश वैश्विक दवा आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और गहरा बनाकर दुनिया भर में सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और किफायती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
अपने संबोधन में जेपी नड्डा ने भविष्य की जरूरतों के अनुकूल रेगुलेटरी इकोसिस्टम के निर्माण पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत डिजिटल परिवर्तन, निरंतर नियामक सुधारों और कड़े गुणवत्ता मानकों के माध्यम से अपनी व्यवस्था को आधुनिक बना रहा है। एक प्रभावी नियामक ढांचा केवल नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह नए अनुसंधानों को बढ़ावा देने और मरीजों तक बेहतर दवाएं पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभाता है।
उभरती वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने सभी देशों से एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि जानकारी साझा करने, रेगुलेटरी तालमेल, क्षमता निर्माण और वैज्ञानिक साझेदारी को सुदृढ़ करके ही वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती प्रदान की जा सकती है।
इसी सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव ने बदलते समय के साथ नियामक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में नई तकनीकें तेजी से शामिल हो रही हैं, इसलिए रेगुलेटरी सिस्टम को भी उसी गति से आधुनिक बनना होगा। इस प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, पारदर्शिता, आपसी विश्वास और वैज्ञानिक उत्कृष्टता आधारभूत तत्व हैं।
स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि आधुनिक नियामकों का दायित्व केवल नियम बनाना नहीं है, बल्कि नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ एक सुदृढ़ और विश्वसनीय ढांचा तैयार करना भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दवाओं की सुरक्षा और उपलब्धता किसी एक देश की सीमा तक सीमित मुद्दा नहीं है। इसलिए वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक आदान-प्रदान और संयुक्त क्षमता निर्माण के माध्यम से ही दुनिया के हर नागरिक तक सुरक्षित और प्रभावी औषधियों की समय पर पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है।