केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्पष्ट किया है कि भारत केवल विनिर्माण संयंत्रों तक सीमित न रहकर एक संपूर्ण और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने की ठोस रणनीति पर काम कर रहा है। सरकार का यह विजन चिप डिजाइन, विनिर्माण, उन्नत पैकेजिंग, उपकरण निर्माण, विशेष सामग्री, अनुसंधान एवं विकास तथा कुशल मानव संसाधन को एक साझा मंच पर लाने का है। 4.3 ट्रिलियन डॉलर के लगातार बढ़ रहे वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में सेमीकंडक्टर आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार बन चुके हैं, जो वाहनों, दूरसंचार, रक्षा उपकरणों से लेकर चिकित्सा प्रणालियों तक में अनिवार्य रूप से उपयोग किए जा रहे हैं।
भारत में इस उद्योग के विकास का प्रयास छह दशक पहले 1960 में फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर की पहल से शुरू हुआ था, जो तत्कालीन नीतियों और उत्पादन कोटा के कारण सफल नहीं हो सका। इसके बाद 2010 के दशक की शुरुआत में भी नीतिगत तालमेल और क्रियान्वयन की कमी के चलते आयातित मशीनरी तक को कस्टम्स से लौटाना पड़ा था। हालांकि, मौजूदा दौर में ‘मेक इन इंडिया’, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), और कराधान सुधारों के माध्यम से पहले एक सुदृढ़ इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण ढांचा तैयार किया गया। आज देश में 300 से अधिक इलेक्ट्रॉनिक्स इकाइयां कार्यरत हैं, जिनका कुल उत्पादन मूल्य 130 अरब डॉलर और निर्यात 48 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है। पेट्रोलियम और आभूषणों को पीछे छोड़कर मोबाइल फोन देश का शीर्ष निर्यात उत्पाद बन गया है, जिससे लगभग 25 लाख लोगों को रोजगार मिला है।
वर्ष 2021 में घोषित 10 अरब डॉलर के ‘सेमीकॉन इंडिया’ कार्यक्रम ने इस नींव पर गति पकड़ी। पांच वर्षों के दौरान सरकार ने 20 अरब डॉलर के कुल प्रस्तावित निवेश वाली 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति दी। इनमें से तीन प्रमुख इकाइयों में वाणिज्यिक उत्पादन भी शुरू हो चुका है—माइक्रोन में 28 फरवरी 2026, केन्स में 31 मार्च 2026 तथा सीजी पावर में 4 जुलाई 2026 से उत्पादन आरंभ हुआ, जबकि शेष संयंत्रों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक कंपनियों ने सेमीकॉन योजना से अलग 3 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।
चिप डिजाइन के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है। 10 वर्षों में 85,000 कुशल इंजीनियर तैयार करने के लक्ष्य और ‘चिप्स टू स्टार्टअप’ पहल के तहत 320 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप्स को ईडीए टूल्स उपलब्ध कराए गए हैं। हाल ही में भारतीय विद्यार्थियों द्वारा डिजाइन की गई 40 चिप्स का प्रदर्शन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष किया गया था। ‘डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव’ (डीएलआई) के तहत 105 स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिला, जिनमें से 24 को 83 मिलियन डॉलर की मदद दी गई और इनमें से 15 उपक्रम 118.5 मिलियन डॉलर की वेंचर कैपिटल जुटाने में सफल रहे। आज वैश्विक डिजाइन केंद्रों में भारतीय विशेषज्ञ 2-नैनोमीटर और 3-नैनोमीटर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं।
इकोसिस्टम के दूसरे चरण के रूप में ‘सेमीकॉन 2.0’ की घोषणा की गई है, जो सात प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित है। इसके तहत छह प्राथमिक क्षेत्रों—कंप्यूट, मेमोरी, रेडियो फ्रीक्वेंसी, पावर, नेटवर्किंग और सेंसर में चिप डिजाइन का विस्तार किया जाएगा। साथ ही, चिप निर्माण में प्रयुक्त 150 से 500 विशेष रसायनों, गैसों और जटिल मशीनरी के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। वर्तमान में निर्माणाधीन दो फैब्स के अलावा अतिरिक्त फैब्रिकेशन इकाइयां स्थापित करने और एडवांस्ड पैकेजिंग क्षमताओं को सशक्त करने की भी योजना है।
परिपक्व 40-नैनोमीटर तकनीक से शुरुआत करने पर उठने वाले सवालों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए मंत्री ने कहा कि जिस तरह एक नए पौधे को फल देने योग्य वृक्ष बनने के लिए प्रारंभिक पोषण और सुरक्षा की आवश्यकता होती है, उसी तरह भारत का पांच वर्ष पुराना उद्योग भी व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ रहा है। सरकार का अगला लक्ष्य आगामी आठ वर्षों में 7-नैनोमीटर से लेकर 3-नैनोमीटर तक की तकनीक देश में विकसित करना और 1,00,000 प्रशिक्षित चिप डिजाइन इंजीनियरों की नई पीढ़ी तैयार कर भारत को संपूर्ण सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन का वैश्विक केंद्र बनाना है।