देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को निर्यात संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में अहम नीतिगत सुधार किए। नए प्रावधानों के तहत सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील राष्ट्रों के लिए तय नियमों को यथावत रखते हुए, ज्यादातर गंतव्यों के लिए गैर-घातक सैन्य सामग्रियों के निर्यात हेतु पूर्व-परामर्श की प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों और निविदाओं के दायरे में आने वाली सभी सामग्रियों के निर्यात से भी परामर्श की शर्त हटा ली गई है। इस कदम से भारतीय रक्षा कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय अवसरों का त्वरित लाभ उठाने और अपनी तकनीकी क्षमताओं को विश्व स्तर पर प्रस्तुत करने का मार्ग प्रशस्त होगा।
रक्षा उत्पादन विभाग द्वारा लागू की गई इस संशोधित व्यवस्था में खुली सामान्य निर्यात लाइसेंस प्रणाली को भी सुव्यवस्थित किया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के दिशानिर्देश में लागू इन सुधारों का मुख्य मकसद कागजी औपचारिकताओं व अनावश्यक देरी को न्यूनतम करना है, जिससे घरेलू उद्योग अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संभावनाओं का तेजी से उपयोग कर सके।
प्रक्रियाओं के इस सरलीकरण के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा के मानकों के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है। यह संपूर्ण कवायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भारत को एक विश्वसनीय, सुदृढ़ और प्रतिस्पर्धी वैश्विक रक्षा निर्यातक बनाने के विजन तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए की गई है।
उल्लेखनीय है कि यह सुधार भारत के रक्षा उद्योग में आए ऐतिहासिक उछाल की पृष्ठभूमि में किए गए हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश का रक्षा उत्पादन 1.78 लाख करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है, वहीं रक्षा निर्यात ने भी 38,424 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व आंकड़ा छुआ है। संशोधित एसओपी इस सकारात्मक गति को दीर्घकालिक स्तर पर बनाए रखने में सहायक सिद्ध होगी।