नई दिल्ली। भारत ने वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 50 अंतरिक्ष मिशन प्रक्षेपित करने का रणनीतिक लक्ष्य निर्धारित किया है। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (आईएन-स्पेस) के चेयरमैन पवन के. गोयनका ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर यह जानकारी साझा करते हुए बताया कि इसरो के तकनीकी सामर्थ्य और निजी कंपनियों की सहभागिता के बल पर भारत वैश्विक अंतरिक्ष पटल पर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर रहा है।
गोयनका ने नीतिगत सुधारों के पांच वर्ष पूरे होने पर लिखा कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी शुरू करने का फैसला दोहरे उद्देश्य के साथ लिया गया था। इसके तहत इसरो को अत्याधुनिक अनुसंधान के लिए मुक्त करना और निजी उद्योगों को विस्तार के अवसर देना तय हुआ था। उन्होंने संतोष जताया कि यह परिकल्पना अब वास्तविकता में बदल चुकी है। पांच वर्षों के भीतर अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़कर 450 के पार पहुंच चुकी है। ये उपक्रम अब साधारण मॉडल बनाने के स्तर से आगे निकलकर उपग्रहों के निर्माण और स्वतंत्र प्रक्षेपण अभियानों को संचालित करने में सफल हो रहे हैं।
एक भारतीय निजी कंपनी द्वारा रॉकेट को सफलतापूर्वक कक्षा में भेजे जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि घरेलू उद्योग अब पूर्णतः व्यावहारिक और वाणिज्यिक स्तर पर कार्य करने के योग्य बन चुका है। अब मुख्य ध्येय उत्पादन और प्रक्षेपण के पैमाने को कई गुना बढ़ाना है। सरकारी ब्योरे के अनुसार, 2014 में मौजूद सिर्फ एक स्टार्टअप के मुकाबले अगस्त 2026 तक ऐसी कंपनियों की संख्या लगभग 440 से अधिक दर्ज की गई। पूंजी निवेश के मोर्चे पर भी भारी प्रगति हुई है, जहां 2021-22 के 100.5 मिलियन डॉलर के मुकाबले मार्च 2026 तक कुल निवेश 618.5 मिलियन डॉलर पर पहुंच गया। इस समय देश का अंतरिक्ष क्षेत्र 9 अरब डॉलर का है, जिसके आगामी एक दशक में 40 से 45 अरब डॉलर तक विस्तारित होने का अनुमान लगाया गया है।
वार्षिक 50 प्रक्षेपणों के स्तर तक पहुंचने के लिए गोयनका ने रेखांकित किया कि छिटपुट परियोजनाओं के बजाय अब बड़े पैमाने पर औद्योगिक निर्माण प्रणाली खड़ी करनी होगी। इसके लिए अधिक मात्रा में रॉकेट और सैटेलाइट्स का निर्माण अनिवार्य होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसरो तकनीकी सीमाओं को तोड़ने और नवाचार करने का दायित्व संभालेगा, जबकि निजी क्षेत्र उन तकनीकों का व्यवसायीकरण करेगा। इस क्षेत्र में स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सल और दिगांतारा जैसे संस्थान प्रक्षेपण यान और उपग्रह तकनीक से लेकर भू-निगरानी से जुड़ी सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब इसरो ने हाल ही में जीएसएलवी-एफ17 के जरिए लगभग 2,367 किलोग्राम वजनी ईओएस-05 उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया है। जीएसएलवी से भेजा गया यह अब तक का सबसे भारी उपग्रह है, जिसे भू-समकालिक कक्षा से देश की सीमाओं की निगरानी, पर्यावरण, कृषि और आपदा प्रबंधन के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। गोयनका ने देश के सामने मौजूद अवसरों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को स्वदेशी निर्माण, स्वदेशी प्रक्षेपण और वैश्विक सेवाओं के केंद्र के रूप में स्थापित होना होगा। उनका मानना है कि यह प्रगति केवल विज्ञान तक सीमित न रहकर देश की समग्र अर्थव्यवस्था, रोजगार और तकनीकी प्रभुत्व को नई दिशा देगी।