दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर 32 किसान संगठनों की बैठक शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीनों खेती कानून वापस लेने की घोषणा के बाद अब इस बैठक में आगे की रणनीति पर विचार किया जा रहा है। पंजाब की किसान जत्थेबंदियों की बैठक में लिए फैसले को रविवार को संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) की बैठक में रखा जाएगा।
दोआबा किसान कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह राय ने बताया कि बैठक शुरू हो गई है। पीएम नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया है। इसके बाद अब आगे के संघर्ष को कैसे चलाया जाना है और किन मांगों को केंद्र से मनवाना है, उस पर विचार किया जा रहा है। बैठक 2 से 3 घंटे चलने की उम्मीद है। बैठक में पीएम की घोषणा के बाद बने हालातों पर खुलकर चर्चा होगी। शहीद किसानों के मसले और किसानों पर दर्ज केसों को लेकर भी आगामी कदम उठाने को लेकर विचार होगा।
किसान नेता मनजीत सिंह राय ने कहा कि किसी एक नेता को गलतफहमी थी कि पंजाब जत्थेबंदियों की बैठक टाल दी गई है। बैठक में चर्चा हो रही है कि आगे संघर्ष को किस ढंग से चलाएंगे। संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से दी गई संसद तक ट्रैक्टर मार्च की कॉल पर भी विचार किया जाना है। क्या यह ट्रैक्टर मार्च किया जाना है या फिर इसे टाला जाएगा। इस पर अभी अलग-अलग यूनियन की अपनी राय है।पंजाब की सभी 32 यूनियनें MSP की मांग को भी प्रमुखता से केंद्र सरकार के आगे रखने की पक्षधर हैं। अगली मांगों को लेकर सरकार के समक्ष अपना पक्ष किस ढंग से रखने, MSP को बिल के तौर लाने और बिजली शोध बिल को समाप्त करने की मांग पर भी विचार विमर्श किया जाएगा।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान किया गया है। मगर किसान नेताओं का कहना है कि इसके साथ उनकी दो और मांगें थीं। MSP को कानून के रूप में लेकर आना और बिजली संशोधन एक्ट को रद्द करना। जब तक उनकी यह दोनों मांगें नहीं मानी जाएंगी, वे तब तक अपना संघर्ष जारी रखेंगे। किसान नेताओं ने तो यहां तक कहा है कि उन्हें प्रधानमंत्री पर यकीन नहीं है, इसलिए जब तक संसद में यह बिल रद्द नहीं कर दिए जाते, तब तक वह दिल्ली के बॉर्डर से हटेंगे नहीं।
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का संघर्ष 14 माह से चल रहा है। किसान 1 साल से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे हुए हैं। अब जब उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बड़ा फैसला लिया गया है। मगर इसके बावजूद किसान यहां से हटने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री के फैसले के बाद भी हालात बदले नहीं है और भाजपा नेताओं को चिंता सताए जा रही है।