सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि राज्यों को संविधान के तहत खदानों और खनिज वाली भूमि पर रॉयल्टी वसूलने का कानूनी अधिकार 

सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि राज्यों को संविधान के तहत खदानों और खनिज वाली भूमि पर रॉयल्टी वसूलने का कानूनी अधिकार 

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम फैसले में कहा कि राज्यों को संविधान के तहत खदानों और खनिज वाली भूमि पर रॉयल्टी वसूलने का कानूनी अधिकार है। संविधान के प्रावधानों के तहत संसद को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की शक्ति नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि खनिजों पर लगने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता। हालांकि नौ जजों की संविधान पीठ में शामिल जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बाकी आठ जजों से अलग फैसले में कहा कि राज्यों को खदानों और खनिजों वाली भूमि पर टैक्स लगाने का अधिकार नहीं है।सीजेआइ डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली संविधान पीठ का 8:1 के बहुमत वाला फैसला सुनाते हुए सीजेआई ने कहा कि संविधान की सूची दो की प्रविष्टि 50 के तहत संसद के पास खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने का अधिकार नहीं है। प्रविष्टि 50 खनिज विकास से संबंधित नियमों और खनिज अधिकारों पर टैक्स से संबंधित है। सीजेआई ने कहा कि शीर्ष कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ का 1989 का फैसला गलत था, जिसमें कहा गया था कि रॉयल्टी एक टैक्स है। संविधान पीठ में सीजेआई और जस्टिस नागरत्ना के अलावा जस्टिस ऋषिकेश रॉय, ए.एस. ओका, जे.बी. पारदीवाला, मनोज मिश्रा, उज्जल भुइयां, सतीश चंद्र शर्मा, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे।केंद्र सरकार के पास अधिसूचना के जरिए रॉयल्टी दरों में संशोधन का अधिकार है, लेकिन ऐसे बदलाव हर तीन साल में एक बार से ज्यादा नहीं हो सकते।

केंद्रीय खान-खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957राज्यों की खनिज अधिकारों पर रॉयल्टी वसूलने की शक्ति को सीमित नहीं करता।

जब तक संसद कोई सीमा नहीं लगाती, तब तक खनिज अधिकारों पर रॉयल्टी लगाने का राज्य का पूर्ण अधिकार अप्रभावित रहता है।

खदान पट्टेधारकों की ओर से खनिज भूमि मालिकों को दी जाने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता। रॉयल्टी खदान के लाइसेंस धारक और राज्य सरकार के बीच एक तरह के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है।

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