वैश्विक अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने G7 शिखर सम्मेलन में दिया ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का नारा, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता पर दिया जोर

वैश्विक अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने G7 शिखर सम्मेलन में दिया ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का नारा, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता पर दिया जोर

फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित 52वें G7 शिखर सम्मेलन के दौरान मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक कल्याण का आह्वान किया। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में आ रही कमी के बीच, उन्होंने परस्पर विश्वास पर आधारित वैश्विक साझेदारी तथा समावेशी विकास की आवश्यकता को रेखांकित किया। समिट के ‘नई साझेदारी का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की पुनर्स्थापना’ विषय पर केंद्रित आउटरीच सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति हमेशा से जनकल्याण से प्रेरित रही है।

शिखर सम्मेलन में भारत के पारंपरिक दृष्टिकोण को साझा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने सदैव संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने वैश्विक मंच पर घोषणा की कि देश के सभी अंतरराष्ट्रीय प्रयास ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ अर्थात सभी के कल्याण और प्रसन्नता के विचार से निर्देशित होते हैं। भारत के विकास दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रगति तभी वास्तविक और प्रभावी हो सकती है, जब वह आम जनता की आकांक्षाओं को समाहित करे। यही लोकतांत्रिक और जन-केंद्रित सिद्धांत भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मुख्य आधार है।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा रोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI), वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन, मिशन LiFE और पर्यावरण संरक्षण के लिए शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने इन पहलों को भारत की वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रमाण बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देश (फर्स्ट रिस्पॉन्डर) के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने बिना किसी भेदभाव के 150 से अधिक देशों को जीवन रक्षक दवाएं और वैक्सीन उपलब्ध कराई थीं।

वैश्विक आपदाओं में भारत द्वारा दी गई मानवीय सहायता का विवरण देते हुए उन्होंने कहा कि चाहे श्रीलंका में चक्रवात हो, अफगानिस्तान का भूकंप हो, मोजाम्बिक में आई बाढ़ हो, या फिर क्यूबा और जमैका में आए भीषण तूफान हों, भारत ने हर परिस्थिति में ‘मानवता प्रथम’ के सिद्धांत को सर्वोपरि माना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की विकास साझेदारियां अन्य देशों में क्षमता निर्माण और कौशल विकास पर केंद्रित हैं। प्रधानमंत्री ने सहयोग की परिभाषा तय करते हुए कहा कि किसी साझेदारी की वास्तविक परीक्षा यह नहीं है कि हम दूसरों के लिए क्या निर्माण करते हैं, बल्कि इसमें है कि हम उन्हें स्वयं के विकास के लिए कितना सक्षम बनाते हैं।

बदलते वैश्विक परिदृश्य और विभिन्न राष्ट्रों के बीच घटते आपसी विश्वास पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक अंतर्संबंधित और एक-दूसरे पर निर्भर है। वर्तमान समय में किसी भी देश की खाद्य, ऊर्जा, स्वास्थ्य, साइबर और आर्थिक सुरक्षा को केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं के भीतर सुरक्षित नहीं किया जा सकता। गतिशीलता, डेटा, पूंजी और तकनीक ने पूरी दुनिया को आपस में जोड़ दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वैश्विक साझेदारियों की सफलता पूरी तरह से आपसी विश्वास पर टिकी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में सबसे मूल्यवान रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, तकनीक या बाजार नहीं, बल्कि परस्पर भरोसा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में तकनीक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का उपयोग किसी देश को डराने या दबाने के हथियार के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए किया जाएगा। विकास के अवसर कुछ सीमित देशों तक सिमटने के बजाय सभी के लिए उपलब्ध होने चाहिए ताकि वैश्विक संस्थाएं आम जनमानस की उम्मीदों पर खरी उतर सकें।

इतिहास और कोरोना काल की चुनौतियों का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि विश्वास के संकट से जूझ रहा है। पीढ़ियों के प्रयास से दशकों में स्थापित हुआ भरोसा अब कमजोर पड़ रहा है। महामारी ने यह कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि वैश्विक एकजुटता और भरोसे के बड़े-बड़े दावे कितने खोखले थे। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रसिद्ध कथन ‘भरोसा करें लेकिन पुष्टि भी करें’ का संदर्भ देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ये शब्द आज के दौर में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति यह हमारा दायित्व है कि हम आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप एक विश्वसनीय और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करें।

उल्लेखनीय है कि फ्रांस के राष्ट्रपति के आधिकारिक निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार को इस उच्च स्तरीय बैठक में सम्मिलित होने के लिए फ्रांस पहुंचे थे। इस प्रतिष्ठित मंच पर भागीदार देश के रूप में यह भारत की 13वीं उपस्थिति है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी लगातार सातवीं बार इस वैश्विक सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सत्र की औपचारिक शुरुआत से पहले, शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन पारंपरिक सामूहिक तस्वीर (फैमिली फोटो) के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच संक्षिप्त और अनौपचारिक बातचीत भी हुई, जिसकी झलकियां सम्मेलन के दृश्यों में साफ देखी गईं।

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