नई दिल्ली में गुरुवार को आयोजित एक रक्षा सम्मेलन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कूटनीति और सैन्य सामर्थ्य में बेहतर तालमेल आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के पास जहां ‘तर्क की ताकत’ है, वहीं ‘ताकत का तर्क’ भी मौजूद है, और वक्त आने पर देश सामने वाले को उसी की भाषा में प्रत्युत्तर देने में पूरी तरह समर्थ है।
एक निजी चैनल के ‘डिफकॉन’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने रेखांकित किया कि सॉफ्ट पावर कभी भी हार्ड पावर का विकल्प नहीं बन सकती, बल्कि यह उसकी पूरक के रूप में काम करती है। उन्होंने भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे सांस्कृतिक चिंतन में शक्ति और शांति कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं, बल्कि दोनों साथ-साथ चले हैं।
स्वतंत्रता के बाद की नीतियों पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि आरंभिक दौर में कुछ शीर्ष नेताओं ने शक्ति और नैतिकता को परस्पर विकल्प मान लेने की भूल की, जिससे रणनीतिक कठिनाइयां पैदा हुईं। उन्होंने कहा कि 1960 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं यह माना था कि देश जमीनी हकीकत से दूर होकर अपनी ही बनाई काल्पनिक दुनिया में जी रहा था।
रक्षा मंत्री ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि बाद के वर्षों में भी सत्ता संभालने वाले कई नेताओं ने पूर्व के घटनाक्रमों से कोई सबक नहीं लिया और अपनी रणनीति में बदलाव नहीं किया। उन्होंने यह मान लिया कि भारत की तरह बाकी देश भी शांति के ही पक्षधर हैं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में इस दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव आया है। अब यह संदेश साफ है कि भारत बातचीत में तर्क रखने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर अपनी सैन्य शक्ति का उपयोग करने का हौसला भी रखता है।
उन्होंने आगे कहा कि आज भारत एक तरफ कूटनीतिक माध्यमों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की वकालत कर रहा है, तो दूसरी तरफ किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अपनी रक्षात्मक क्षमताओं को भी मजबूत बना रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक और पिछले वर्ष चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का संदर्भ देते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि इन कार्यवाहियों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अपनी संप्रभुता की सुरक्षा के लिए न केवल आवश्यक सैन्य सामर्थ्य रखता है, बल्कि उसके प्रयोग की ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति भी रखता है।