रबी फसलों के लिए देश में 163 लाख मीट्रिक टन खाद का सुरक्षित भंडार, किसानों पर नहीं पड़ेगा वैश्विक कीमतों का बोझ: शिवराज सिंह चौहान

रबी फसलों के लिए देश में 163 लाख मीट्रिक टन खाद का सुरक्षित भंडार, किसानों पर नहीं पड़ेगा वैश्विक कीमतों का बोझ: शिवराज सिंह चौहान

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित ‘राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन-रबी अभियान 2026’ के दौरान आश्वस्त किया कि देश में रबी सत्र के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध है और किसानों को किसी भी प्रकार की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि प्रतिकूल मौसम, अल-नीनो के साये और वैश्विक स्तर पर खादों की बढ़ती लागत के बीच केंद्र सरकार कृषकों के हितों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के लिए अन्नदाताओं को एकतरफा रूप से जिम्मेदार ठहराने और पराली के बहाने उन्हें प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति का कड़ा विरोध दर्ज कराया।

कृषि मंत्री ने रबी तैयारियों का ब्योरा देते हुए बताया कि केंद्र ने राज्यों के साथ पिछले 15 दिनों से सघन विचार-विमर्श किया है। चूंकि कृषि राज्य सूची का विषय है, इसलिए राज्यों की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई गई हैं। पहले दिन कृषि प्रधान सचिवों, कृषि उत्पादन आयुक्तों (एपीसी) और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ 10 घंटे तक चली विस्तृत समीक्षा बैठक के बाद राज्यों के कृषि मंत्रियों की मौजूदगी में राष्ट्रीय कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया गया। रबी सीजन 2026-27 के लिए राज्यों द्वारा यूरिया, डीएपी और एनपीके को मिलाकर 380 लाख मीट्रिक टन उर्वरक की मांग रखी गई है, जिसके मुकाबले देश में वर्तमान में 163 लाख मीट्रिक टन से अधिक का भंडार मौजूद है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह उपलब्धता 122 लाख मीट्रिक टन थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की महंगाई का आर्थिक बोझ किसानों पर नहीं आने दिया जाएगा।

उत्पादन के आंकड़ों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि 2015 के बाद देश के कृषि परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। वर्ष 1967 से 1995 के मध्य खाद्यान्न उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि 4.1 मिलियन टन और 1996 से 2014 के बीच 3.9 मिलियन टन थी, जो 2015 के बाद बढ़कर 8.4 मिलियन टन वार्षिक हो गई। इस दौरान कृषि विकास दर भी 3 प्रतिशत से बढ़कर 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गई। वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित 362.60 मिलियन टन के लक्ष्य के मुकाबले वास्तविक उत्पादन 376.56 मिलियन टन दर्ज हुआ था। आगामी वर्ष 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 373.93 मिलियन टन रखा गया है, जिसमें रबी सत्र की हिस्सेदारी 177.72 मिलियन टन तय की गई है। जल स्तर और मानसूनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कम पानी वाले क्षेत्रों में मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की खेती को प्राथमिकता दी जा रही है।

खरीफ सत्र की समीक्षा करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अल-नीनो से निपटने की तैयारी अप्रैल में ही प्रारंभ कर दी गई थी। शुरुआती दौर में वर्षा की कमी 14 प्रतिशत थी, जो बाद की मानसूनी सक्रियता से घटकर 12 प्रतिशत रह गई। वैज्ञानिक मानदंडों के अनुसार 19 प्रतिशत से अधिक की कमी गंभीर सूखा मानी जाती है। सम्मिलित प्रयासों से बुवाई क्षेत्र में भारी गिरावट नहीं आई और यह कमी लगभग 1 प्रतिशत तक ही सीमित रही। यद्यपि धान के रकबे में करीब 16.32 लाख हेक्टेयर तथा मक्का, सोयाबीन व कपास में कुछ कमी आई, लेकिन उड़द, तुअर, ज्वार, बाजरा, तिल और सूरजमुखी के रकबे में बढ़ोतरी हुई। प्राकृतिक आपदाओं से कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में लगभग 6.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के अनुरोध पर नुकसान का जायजा लेने के लिए 3 अक्टूबर को केंद्रीय दल भेजे जा रहे हैं। त्वरित राहत के लिए एसडीआरएफ (जिसमें 75% केंद्र और 25% राज्य का अंशदान होता है) के अलावा क्षतिग्रस्त मकानों हेतु प्रधानमंत्री आवास योजना से सहायता दी जा रही है, जबकि एनडीआरएफ की अतिरिक्त राशि पर निर्णय सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद होगा।

किसानों के आर्थिक संरक्षण और मिट्टी की सेहत के लिए कई नीतिगत फैसलों की घोषणा की गई। 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ संचालित होगा। इससे पूर्व प्रमुख राज्यों के दो-दो जिलों में चलाए गए पायलट प्रोजेक्ट में संतुलित खाद उपयोग से 27 प्रतिशत तक खपत घटी और 1,400 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई। अब वैज्ञानिक और प्रशासनिक दल गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक करेंगे। वहीं, मूल्य समर्थन के मोर्चे पर पीएम-आशा योजना के तहत यदि दलहन-तिलहन के बाजार भाव एमएसपी से नीचे जाते हैं, तो नेफेड और एनसीसीएफ राज्यों की प्रतीक्षा किए बिना सीधे मंडियों से खरीद शुरू करेंगी। राज्यों को योजनाओं के सुचारू संचालन हेतु आरकेवीवाई और कृषोन्नति योजना के तहत 7,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहले ही भेजी जा चुकी है। इसके अतिरिक्त, एग्रीस्टैक के जरिए विशिष्ट फार्मर आईडी निर्माण, प्राकृतिक खेती का विस्तार, एफटीए के जरिए वैश्विक बाजार तक पहुंच, तथा गन्ने के रेड रॉट व कपास के पिंक बॉलवर्म से बचाव के लिए शोध पर बल दिया जा रहा है।

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के संदर्भ में शिवराज सिंह चौहान ने आधिकारिक रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि किसानों को खलनायक बनाकर पेश करना सर्वथा अनुचित है। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि पराली की प्रदूषण में हिस्सेदारी 2019-20 के लगभग 7 प्रतिशत से घटकर अब मात्र 2.5 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने खेतों को रेड जोन में डालने या किसानों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाइयों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसानों का उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं है; समाधान संवाद, आवश्यक संसाधन और उपयुक्त कृषि यंत्र सुलभ कराने से ही संभव होगा।

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