नई दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट ने रबी विपणन सत्र 2027-28 के तहत सभी 6 अधिसूचित रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि को अपनी आधिकारिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिया गया यह कदम किसानों को उनकी उपज का उचित व लाभकारी प्रतिफल दिलाने के उद्देश्य से प्रेरित है।
घोषित मूल्य संरचना में भारित औसत उत्पादन लागत (A2+FL) पर किसानों को 50 फीसदी से लेकर 106 फीसदी तक का प्रतिफल मिलेगा। इसमें गेहूं उत्पादकों को लागत पर 106 प्रतिशत का उच्चतम मार्जिन प्राप्त होगा, जबकि तिलहन वर्ग में रेपसीड-सरसों के लिए 96 प्रतिशत और दलहन में मसूर के लिए 92 प्रतिशत का मार्जिन सुरक्षित किया गया है।
कैबिनेट द्वारा मंजूर संशोधित दरों के मुताबिक, कुसुम की MSP में 675 रुपये की सबसे बड़ी बढ़ोतरी की गई है, जिससे इसकी नई दर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। रेपसीड एवं सरसों का समर्थन मूल्य 413 रुपये बढ़कर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ है। मसूर के भाव में 390 रुपये की तेजी के साथ नया स्तर 7,390 रुपये, जौ में 136 रुपये की वृद्धि के साथ 2,286 रुपये, चने में 83 रुपये के इजाफे के साथ 5,958 रुपये और गेहूं में 25 रुपये की बढ़ोतरी के साथ नई दर 2,610 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है।
दलहन एवं तिलहन के क्षेत्र में स्वावलंबन हासिल करने की कार्ययोजना साझा करते हुए कृषि मंत्री ने बताया कि भारत को हर वर्ष करीब 60 लाख मीट्रिक टन दालें कनाडा जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मंगानी पड़ती हैं। इस निर्भरता को खत्म करने के लिए चने और मसूर के दामों में वृद्धि के साथ-साथ सरकारी खरीद को 35 गुना तक बढ़ाया गया है। इसके अलावा, धान की कटाई के बाद अनुपयोगी रहने वाले खेतों (राइस फेलो) में दलहनी खेती को गति देने के लिए कृषकों को बीज, आधुनिक तकनीक और आर्थिक इमदाद मुहैया कराई जा रही है। खाद्य तेलों की बाहरी निर्भरता कम करने के लिए सरसों और दूरदराज के आदिवासी इलाकों में होने वाली कुसुम फसल को प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही, वर्ष 2025-26 में हुए 1.13 लाख मीट्रिक टन जौ के आयात को रोकने के लिए जौ की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
मंत्रालय ने भौगोलिक विविधताओं को ध्यान में रखकर राज्यवार रबी योजनाएं भी तैयार की हैं। दक्षिण, उत्तर और मध्य भारत के राज्यों के साथ विचार-विमर्श के बाद महाराष्ट्र व कर्नाटक जैसे सूखे प्रभावित क्षेत्रों के लिए कम पानी वाली फसलों का खाका खींचा गया है, वहीं प्रचुर जल उपलब्धता वाले मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में उत्पादन की सघन पद्धति अपनाई जाएगी। चौहान ने रेखांकित किया कि देश के 86 प्रतिशत कृषक लघु व सीमांत वर्ग से आते हैं और कुल आबादी का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा आजीविका के लिए खेती पर आश्रित है, जिनके आर्थिक उत्थान और पोषण सुरक्षा के लिए यह नीतिगत प्रयास किए गए हैं।