राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को नागपुर में आयोजित संघ के वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम में कहा कि शासन बदलने के उद्देश्य से खड़े किए जाने वाले आंदोलन बुनियादी समस्याओं को हल नहीं करते, बल्कि वे सियासी स्वार्थों का साधन बनकर सामाजिक ताने-बाने को बांटने का काम करते हैं।
अपने संबोधन से पहले पारंपरिक शस्त्र पूजन करने के बाद संघ प्रमुख ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया में हाल ही में देखने को मिली हिंसक घटनाओं का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि निहित स्वार्थों से जुड़ी ताकतें अपने अनुकूल माहौल तैयार करने के लिए शासन बदलने की राह चुनती हैं, मगर इससे वांछित नतीजे शायद ही सामने आते हैं। उनका कहना था कि सत्ता परिवर्तन से हालात सुधरने का दावा हकीकत में कभी सच साबित नहीं हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने रेखांकित किया कि एक सबल भारत ऐसी ताकतों की राह का रोड़ा बनता है, जिस कारण देश में फूट डालने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ वैश्विक ताकतें भारत की उन्नति तो चाहती हैं, परंतु वे नहीं चाहतीं कि यह देश इतना शक्तिशाली बने कि उनके प्रभुत्व के लिए चुनौती बन जाए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध-प्रदर्शनों पर चर्चा करते हुए भागवत ने कहा कि जन आंदोलनों का प्राथमिक लक्ष्य दिक्कतों का हल निकालना होना चाहिए, न कि समाज में दरार पैदा करना। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है और समस्याएं भी सामने आती रहेंगी, किंतु इन आंदोलनों की दिशा केवल समाधान की खोज होनी चाहिए। जब ऐसे कदम लोक कल्याण से भटककर अन्य मकसदों से संचालित होते हैं, तो वे एक सियासी औजार का रूप ले लेते हैं और वर्गों, विचारों अथवा व्यक्तियों के प्रति कटुता को हवा देते हैं। उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से अपील की कि वे ऐसा कोई आचरण न करें जिससे वैमनस्य फैले। उन्होंने स्मरण कराया कि भावनाएं कितनी भी उग्र हों, संविधान की मर्यादा, सभ्य संवाद और शालीनता के मानदंडों का पालन अनिवार्य है।
युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन और आधुनिक माध्यमों पर बात करते हुए उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अनियंत्रित सामग्री पर चिंता जताई और सरकार से समाजहित में कड़े नियम बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि कई देशों ने दुष्परिणामों को देखते हुए सोशल मीडिया पर अंकुश लगाए हैं और भारत में भी अब इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक जीवन को सुगम बना सकते हैं, लेकिन वे साध्य नहीं केवल साधन हैं। नेपाल में आई हालिया जलप्रलय का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे हिमालयी क्षेत्र में हुए असंतुलित विकास का परिणाम बताया। साथ ही, कृत्रिम मेधा (एआई) के दुरुपयोग पर सचेत करते हुए उन्होंने कहा कि इसका उपयोग और इसमें दक्षता जरूरी है, पर इसके जरिए तैयार किए जा रहे फर्जी वीडियो दुष्प्रचार का नया माध्यम बन गए हैं। उन्होंने मादक द्रव्यों के बढ़ते चलन को एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती करार देते हुए परिजनों से युवाओं में सही विवेक जगाने की अपील की।
संबोधन के अंतिम भाग में भागवत ने राष्ट्रीय एकता को संविदा के बजाय आंतरिक और दिली जुड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा’ के भाव वाली हिंदू दृष्टि किसी खास पूजा पद्धति, खान-पान, भाषा या दलगत सोच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर किसी की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखते हुए विश्व को जोड़ने की क्षमता रखती है। उन्होंने दोहराया कि संघ एक संगठित और सशक्त हिंदू समाज का निर्माण चाहता है, जो सर्वपंथ समादर और राष्ट्रीय एकता के पूर्णतः अनुकूल है। उन्होंने सीख दी कि श्रेष्ठ विचारों से श्रेष्ठ कर्म और चरित्र से ही भविष्य का निर्माण होता है, और विविधताओं का सम्मान व संरक्षण ही भारत की वास्तविक पहचान है।