जानिए काबुल के गुनहगार ISIS-K को

काबुल एयरपोर्ट पर हुए हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट खुरासान (ISIS-K) ने ली है। इस हमले में एयरपोर्ट पर तैनात 13 अमेरिकी सैनिकों समेत 108 लोगों की मौत हुई है। रिपोर्ट बताती हैं कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट का क्षेत्रीय गुट ISIS-K लंबे समय से अमेरिकी सैनिकों पर हमले की योजना बना रहा था।

ISIS-K का नाम उत्तरपूर्वी ईरान, दक्षिणी तुर्कमेनिस्तान और उत्तरी अफगानिस्तान में आने वाले क्षेत्र के नाम पर रखा गया है। यह संगठन सबसे पहले 2014 में पूर्वी अफगानिस्तान में सक्रिय हुआ। यहां से इसने बेरहमी और क्रूरता की पहचान बनाई।

पाकिस्तान के सैकड़ों तालिबानी इस संगठन के साथ जुड़े और चरमपंथी हमलों को अंजाम दिया। जब सेना की मदद से इन्हें निकाला गया तो ये अफगानिस्तान की सीमा पर आ गए और फिर यहीं से ऑपरेट करने लगे। ताकत इसलिए बढ़ती गई, क्योंकि तालिबान पश्चिमी देशों और सोच के प्रति नरम होता गया। ऐसे में तालिबान के असंतुष्ट लड़ाके ISIS-K में जाने लगे।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी के अधिकारियों के मुताबिक, ISIS-K में सीरिया और दूसरे विदेशी चरमपंथी संगठनों के कुछ आतंकी भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में इस समूह के 10 से 15 प्रमुख आतंकियों की पहचान की है। ISIS-K में अफगानियों समेत दूसरे आतंकी समूहों से पाकिस्तानी और उज्बेकिस्तान के आतंकी शामिल हैं।

इस समूह ने हाल के कुछ वर्षों में पूर्वी अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। खासतौर से अफगानिस्तान के नंगरहार और कुनार प्रांतों में इसकी अच्छी पहुंच है। इस संगठन ने काबुल में स्लीपर सेल तैनात किए हैं, जिन्होंने 2016 से बड़ी संख्या में काबुल और उसके बाहर आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया है। ISIS-K शुरुआती तौर पर सिर्फ पाकिस्तान से सटे कुछ इलाकों तक सीमित था, लेकिन अब यह जाज्वान और फरयाब समेत उत्तरी प्रांतों में दूसरा प्रमुख गुट बन गया है।

ISIS और तालिबान दोनों ही कट्‌टर सुन्नी इस्लामिक आतंकी हैं, फिर भी दोनों एक दूसरे का विरोध करते हैं। ISIS-K और तालिबान के बीच कई मुद्दों पर असहमति है। ISIS ने तालिबान पर आरोप लगाया है कि उसने जिहाद और युद्ध का मैदान छोड़कर दोहा और कतर के बड़े होटलों में बैठकर शांति के समझौते किए हैं।

स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड को-ऑपरेशन के मुताबिक, दोनों संगठनों के बीच विचारधारा का फर्क है। इसके साथ ही संसाधनों को लेकर संघर्ष भी दोनों के बीच लड़ाई का बड़ा कारण है।

असोसिएटिड प्रेस के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में तालिबान ने अमेरिका के साथ समझौता करने की कोशिशें की हैं। इससे नाखुश लोग तालिबान छोड़कर ज्यादा कट्‌टर इस्लामिक स्टेट से जा मिले।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *