नोटबंदी के बाद से देश के हाउसिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव आया है। 2016 के आखिर से अब तक देश के हाउसिंग मार्केट में काले धन का इस्तेमाल 75-80% घटा है और इन्वेंटरी में भी कमी आई है। नोटबंदी से पहले के उलट नई लॉन्चिंग के मुकाबले बिक्री ज्यादा बढ़ी है। प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म एनारॉक की एक रिसर्च से यह जानकारी सामने आई है।
2016 में रेरा लागू हुआ और इसी साल हुई नोट बंदी
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016 में रेरा लागू हुआ और उसी साल 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा कर दी गई, इसके बाद जुलाई 2017 से वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू हो गया। इन सब का रियल एस्टेट पर गहरा असर पड़ा। 2013 से लेकर 2016 की तीसरी तिमाही तक 7 बड़े शहरों में 16.15 लाख मकानों वाले नए हाउसिंग प्रोजेक्ट लॉन्च हुए थे। इसके मुकाबले 11.78 लाख मकानों की बिक्री हुई थी। लेकिन 2016 की चौथी तिमाही से लेकर 2021 की तीसरी तिमाही के बीच इन शहरों में 9.04 लाख मकानों की लॉन्चिंग के मुकाबले 10.37 लाख मकानों की बिक्री हुई।एनारॉक ग्रुप के चेयरमैन अनुज पुरी ने कहा कि नोटबंदी, जीएसटी और रेरा के चलते हाउसिंग सेक्टर की एक तरफ से साफ-सफाई हो गई। ज्यादातर खामियां दूर हो गईं और इस बाजार पर ग्राहकों का भरोसा बहाल हुआ। इस बीच कोविड महामारी आ गई और लोगों को अपने घर की अहमियत समझ में आई। इसके चलते मकानों की बिक्री तेजी से बढ़ने लगी।रिपोर्ट के मुताबिक, नए मकानों के मुकाबले पुराने मकानों के बाजार पर नोटबंदी का ज्यादा असर हुआ। दरअसल पुराने मकानों और लग्जरी हाउसिंग सेगमेंट में नकद कारोबार ज्यादा होता है। नोटबंदी ने इसी तरह की डील पर सबसे बड़ी चोट की थी। नए और किफायती मकानों में कम कैश डील के चलते यह सेगमेंट कम प्रभावित हुआ। इस सेगमेंट में डेवलपरों की बिक्री बढ़ी।
नोटबंदी के चलते हाउिसंग मार्केट में पारदर्शिता बढ़ी
- ब्रांडेड डेवलपर और रियल एस्टेट सेक्टर की लिस्टेड कंपनियों के हाउसिंग प्रोजेक्ट की डिमांड बढ़ी।
- छोटे-मोटे डेवलपर, जिनका बिजनेस मुख्य रूप से कैश डील के भरोसे चल रहा था, बाहर हो गए।
- नोटबंदी के बाद रेरा और जीएसटी जैसे बदलावों के चलते रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता आई।
- कम दाम पर सरकार का जोर देख बड़े डेवलपरों ने सस्ते, मिड-सेगमेंट हाउसिंग पर फोकस किया।