कांग्रेस की अन्य बैठकों से अलग हटकर रायपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन की शुरुआत हुई। पहली बार ऐसा हुआ कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की स्टीयरिंग कमेटी की बैठक गांधी परिवार के बिना हुई। गांधी परिवार की अनुपस्थिति कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी परिवार यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी के बड़े फैसले सीनियर लीडर कर रहे हैं।
गांधी परिवार के बिना भी पार्टी में बड़े फैसले लिए जा रहे हैं। लोकतांत्रिक पार्टी में सारे लोग मिलकर फैसले करते हैं। इसके अलावा निर्वाचित अध्यक्ष के तौर पर मल्लिकार्जुन खरगे को गांधी परिवार फ्री हैंड भी देना चाहता है। यह संदेश देने की नीयत से ही सोनिया और राहुल गांधी स्टीयरिंग कमेटी की बैठक खत्म होने के बाद अधिवेशन स्थल पहुंचे।
गांधी परिवार के अध्यक्ष के बिना निर्वाचित अध्यक्ष के तौर पर खरगे के नेतृत्व में यह पहला अधिवेशन था। खरगे के निर्वाचन के पहले जिस तरह जी-20 के नेताओं ने पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र की दुहाई देते हुए विरोध के स्वर मुखर किए थे, उसकी छाया इस अधिवेशन की शुरुआत में ही दिखाई पड़ी।
दोबारा इस तरह के स्वर सुनाई ना पड़े इसके लिए बाकायदा तीनों दिनों के अधिवेशन की शुरुआत में राजनीतिक संदेश देने का काम किया गया। पार्टी में यह संदेश प्रसारित होने के बाद बाकायदा सोनिया और राहुल अधिवेशन में शामिल होने के लिए पहुंच गए।इस कदम के पीछे बड़ी राजनीतिक सोच बताई जा रही है। भाजपा के परिवारवाद का जवाब भी इस फैसले में छिपा हुआ है।
आने वाले दिनों में तीन राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं। इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में भी पार्टी को जाना है। इनकी तैयारियों को ध्यान में रखते हुए पार्टी अधिवेशन में रोड मैप बनाने जा रही है। इसलिए पार्टी में बगावती तेवर और सुरों को ठंडा करने की रणनीति अपनाई गई है।
इन राज्यों के मुद्दे तय करने से लेकर वहां की लीडरशिप को जिम्मेदारी देने का काम इसी तरह खरगे के नेतृत्व वाली सीडब्लूसी के द्वारा ही कराया जाएगा। इसके अलावा छह मुद्दों पर कमेटियां बनाकर आगामी चुनावों के लिए कांग्रेस अपना एजेंडा तय करने वाली है। इन कमेटियों को भी गांधी परिवार ने पूरी तरह से फ्री कर दिया कि वे अपने-अपने हिसाब से सब्जेक्ट तय करें और राजनीतिक प्रस्ताव तैयार करें।