पोर्ट ब्लेयर: डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के स्थानीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि “समग्र सरकार और समग्र समाज” के दृष्टिकोण के साथ तकनीक को लैब से निकालकर सीधे स्थानीय निवासियों और स्वयं सहायता समूहों तक पहुँचाया जा रहा है।
मंत्री ने विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया ताकि घरेलू आय में वृद्धि हो सके। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों, विशेषकर यूरोप में गैर-पशु आधारित खाद्य उत्पादों और वैकल्पिक समुद्री पोषण की भारी मांग है। भारत अपनी समुद्री संपदा के माध्यम से इन वैश्विक अवसरों का लाभ उठा सकता है। डॉ. सिंह ने कहा कि लाल किले की प्राचीर से दो बार ‘डीप ओशन मिशन’ का उल्लेख होना इस क्षेत्र के प्रति प्रधानमंत्री की गंभीरता को दर्शाता है। आने वाले समय में सीएसआईआर (CSIR) और अन्य अनुसंधान केंद्र मिलकर अंडमान को ब्लू इकोनॉमी का ग्लोबल हब बनाएंगे।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) की इकाई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने समुद्री विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी के एकीकरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिनके पास जैव-अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए समर्पित ‘बायोE3’ (BioE3) नीति है।
कार्यक्रम की प्रमुख तकनीकी घोषणाएं:
- ओपन-सी केज कल्चर: समुद्री मछलियों के पालन के लिए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत।
- समुद्री शैवाल (Seaweed): बड़े पैमाने पर सीवीड की खेती के लिए तकनीक का हस्तांतरण।
- विकल्प और नवाचार: प्लास्टिक के विकल्प के रूप में जैव-अपघटनीय (Biodegradable) पदार्थ और समुद्री संसाधनों से औषधीय यौगिक तैयार करना।
- वेस्ट-टू-वेल्थ: समुद्री कचरे से उपयोगी उत्पाद बनाने वाली प्रौद्योगिकियों पर विशेष ध्यान।
इस अवसर पर अंडमान के सांसद बिष्णु पद राय और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक भी मौजूद रहे।