एक ओर जहाँ दुनिया पश्चिम एशिया के युद्ध और उससे उपजे आर्थिक संकट (खाद्य और ईंधन संकट) से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर भारत अपने बुनियादी ढांचे को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान कर रहा है। जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन इसी रणनीति का हिस्सा है। 11,200 करोड़ रुपये की लागत और 3000 एकड़ में फैला यह हवाई अड्डा केवल एक परिवहन केंद्र नहीं, बल्कि उत्तर भारत का आर्थिक प्रवेश द्वार बनने जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि ‘सरकार संकट का बोझ आम जनता पर नहीं आने देगी’, उनकी आर्थिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विशेष रूप से जब कच्चा तेल और गैस का आयात सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा हो, तब सेमीकंडक्टर जैसी फैक्ट्रियों और जेवर जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स का समय पर पूरा होना यह संकेत देता है कि भारत अपनी ‘आत्मनिर्भर’ छवि को लेकर गंभीर है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के शब्दों में कहें तो, यह एयरपोर्ट दिल्ली-एनसीआर की ‘दूसरी धड़कन’ बनकर उभरेगा, जो क्षेत्रीय विकास को नई गति प्रदान करेगा।