अमरीकी फेडरल कोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध ठहराया

अमरीकी फेडरल कोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध ठहराया

वाशिंगटन स्थित अमेरिकी फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 10 प्रतिशत वैश्विक आयात शुल्क (ग्लोबल टैरिफ) के प्रस्ताव को रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति द्वारा टैरिफ लगाने के लिए 1974 के व्यापार कानून का सहारा लेना अनुचित था। फरवरी माह में लागू की गई इस घोषणा को कोर्ट ने कार्यपालिका के अधिकारों का उल्लंघन माना है, जिससे ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को तगड़ा कानूनी झटका लगा है।

न्यायाधीशों के पैनल ने दो के मुकाबले एक मत से निर्णय देते हुए कहा कि 1974 के अधिनियम की धारा 122 का प्रयोग व्यापक व्यापार घाटे को ठीक करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि यह प्रावधान 1970 के दशक की विशेष अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक चुनौतियों और भुगतान-संतुलन के संकटों से निपटने हेतु तैयार किया गया था। वर्तमान समय के व्यापार और चालू खाते के घाटे को इस पुराने कानून के दायरे में लाना वैधानिक रूप से गलत है।

इस फैसले को सुनाते हुए जज मार्क ए. बार्नेट और क्लेयर आर. केली ने कहा कि ट्रंप प्रशासन यह साक्ष्य देने में विफल रहा कि टैरिफ लगाने की कानूनी अनिवार्यताएं पूरी हुई थीं। धारा 122 के तहत मिलने वाली शक्तियां राष्ट्रपति को सीमित समय (150 दिन) के लिए 15 प्रतिशत तक अधिभार लगाने की अनुमति देती हैं, लेकिन इसके लिए परिस्थितियां कानून सम्मत होनी चाहिए। कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि राष्ट्रपति को इस तरह से शक्तियां दी गईं, तो वे बिना किसी विधायी नियंत्रण के व्यापारिक शुल्क थोपने लगेंगे।

प्रशासन की दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि भुगतान-संतुलन घाटे और सामान्य व्यापार घाटे में मौलिक अंतर है, जिसे सरकार ने नजरअंदाज किया। हालांकि, बेंच के एक सदस्य जज टिमोथी स्टैंसियू ने प्रशासन का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति के आर्थिक फैसलों और घाटे की गणना के तरीकों को अदालती दायरे में सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

यह इस साल ट्रंप प्रशासन की व्यापारिक योजनाओं को मिली दूसरी बड़ी कानूनी शिकस्त है, क्योंकि इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय भी उनकी टैरिफ नीतियों को निरस्त कर चुका है। अब इस मामले के फेडरल सर्किट अपीलीय कोर्ट में जाने की उम्मीद है। यदि वहां से भी राहत नहीं मिलती है, तो अंतिम निर्णय के लिए यह मामला पुनः सुप्रीम कोर्ट के द्वार पर दस्तक दे सकता है।

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