असम सरकार ने सोमवार को राज्य विधानसभा के पटल पर बहुप्रतीक्षित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक, 2026 प्रस्तुत कर दिया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की अनुपस्थिति में उनकी ओर से संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने इस विधेयक को सदन के सामने रखा। इस दौरान विपक्षी विधायकों ने कानून का कड़ा विरोध करते हुए विधानसभा अध्यक्ष से इसे पेश न करने की अपील की, जिसे स्वीकार नहीं किया गया।
इस विधायी कदम की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि विधानसभा में इस विधेयक के आने से अब इस विषय पर व्यापक और खुली बहस का रास्ता साफ हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि इस विमर्श से यह स्पष्ट हो सकेगा कि असम के लिए समान नागरिक संहिता वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग क्यों है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह कानून हमारे देश के नीति-निर्माताओं और संस्थापकों के सपनों को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। दूसरी तरफ, संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर मुख्यमंत्री की तरफ से सदन में विधेयक पेश किए जाने की आधिकारिक पुष्टि की।
उल्लेखनीय है कि असम कैबिनेट ने पिछले हफ्ते ही समान नागरिक संहिता के इस मसौदे को अपनी हरी झंडी दी थी। नई चुनी गई असम विधानसभा के पहले सत्र की शुरुआत से ठीक पहले मंत्रिमंडल ने यह अहम फैसला लिया था। विधानसभा के इस सत्र में विधेयक पर विस्तृत चर्चा मंगलवार को होने की उम्मीद जताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए ही विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल को एक दिन और बढ़ाते हुए अब 27 मई तक के लिए बढ़ा दिया गया है।
प्रस्तावित कानून के दायरे और उद्देश्यों को लेकर सरकार का रुख साफ है। सरकार के मुताबिक, यूसीसी का मूल लक्ष्य मजहब की दीवारों से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के लिए शादी, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे संवेदनशील पारिवारिक मामलों में एक समान व्यवस्था लागू करना है। यह नया कानून बहुविवाह की प्रथा पर रोक लगाने, विवाह के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र तय करने, विरासत के अधिकारों को सुव्यवस्थित करने और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों को विनियमित करने का काम करेगा। हालांकि, मुख्यमंत्री ने पूर्व में ही यह आश्वस्त कर दिया था कि राज्य के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में रहने वाली जनजातीय आबादी (आदिवासी समुदायों) को इस कानून के कड़े प्रावधानों से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।
इस विधेयक के पारित होते ही असम देश का ऐसा तीसरा राज्य बन जाएगा जिसने समान नागरिक संहिता को अपने यहां वैधानिक रूप दिया है। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात इस दिशा में कदम उठा चुके हैं। देश में समान नागरिक संहिता का मूल विचार यही है कि नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने के लिए एक ऐसा एकीकृत ढांचा तैयार किया जाए, जो बिना किसी धार्मिक भेदभाव के देश के हर नागरिक पर एक समान रूप से प्रभावी हो।
इस विषय को लेकर कानूनी और संवैधानिक मोर्चे पर भी बहस छिड़ी हुई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 जहां देश के नागरिकों को अपनी आस्था के पालन की आजादी देते हैं और धार्मिक संगठनों को अपने आंतरिक मामलों के संचालन का अधिकार सौंपते हैं, वहीं दूसरी तरफ संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत यह अपेक्षा करता है कि देश की सरकारें राष्ट्रीय नीतियां तैयार करते समय सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेंगी।