भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को समाप्त हुई अपनी तीन दिवसीय बैठक के बाद देश की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। केंद्रीय बैंक ने इस आर्थिक समीक्षा में साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में जारी उतार-चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में लगातार आ रही रुकावटें और मौसम संबंधी अनिश्चितताएं आने वाले समय में घरेलू विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं। चालू वर्ष की मौद्रिक नीति के निर्णयों की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद इस वित्तीय वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने की संभावना है।
केंद्रीय बैंक ने आगामी तिमाहियों के लिए विकास दर के आंकड़ों को चरणबद्ध तरीके से साझा किया है। पूर्व में लगाए गए 6.9 प्रतिशत के अनुमान में संशोधन की जानकारी देते हुए आरबीआई गवर्नर ने बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में इसके बढ़कर 6.8 प्रतिशत पर पहुंचने की उम्मीद है। आर्थिक गतिविधियों में इस उतार-चढ़ाव के बाद भी घरेलू बाजार को लेकर सकारात्मक रुख बना हुआ है।
देश के आर्थिक मोर्चे पर मजबूती का जिक्र करते हुए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भारत के मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) और सर्विस (सेवा) सेक्टर के पीएमआई आंकड़े दोनों क्षेत्रों में आ रही मजबूती को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। वर्तमान में व्यावसायिक भरोसा काफी मजबूत है और बाजार में मांग की स्थिति भी बेहतर नजर आ रही है। ग्राहकों के बढ़ते खर्च के कारण निजी खपत की रफ्तार थमी नहीं है, जिससे अर्थव्यवस्था को सीधा सहारा मिल रहा है। इसके अतिरिक्त, निर्माण और अन्य लागतों में बढ़ोतरी के बावजूद निजी व सरकारी दोनों ही स्तरों पर निवेश की गति काफी संतोषजनक बनी हुई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अप्रैल 2026 के दौरान देश के माल निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है, भले ही इस दौरान माल ढुलाई और बीमा के खर्च ऊंचे स्तर पर दर्ज किए गए हों।
वैश्विक स्तर पर तकनीकी बदलावों और चुनौतियों के बीच भारतीय सेवाओं के प्रदर्शन की सराहना की गई है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर दुनिया भर में उपजी चिंताओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय सेवाओं की मांग में कोई कमी नहीं आई है और इसका निर्यात लगातार मजबूत बना हुआ है। यह स्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच का काम कर रही है। हालांकि, पश्चिमी एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अन्य वैश्विक संकटों का मुकाबला भारतीय अर्थव्यवस्था ने अब तक दृढ़ता से किया है, लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत का असर अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है।
महंगाई के मोर्चे पर केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1 प्रतिशत पर रखा है। तिमाही आधार पर आकलन करें तो पहली तिमाही में महंगाई दर के 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.1 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में बढ़कर 5.9 प्रतिशत और अंतिम तिमाही में कुछ घटकर 5.4 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है। आरबीआई का मानना है कि फिलहाल वैश्विक स्तर पर बढ़ी कीमतों का पूरा असर घरेलू बाजारों में नहीं दिखने के कारण महंगाई नियंत्रण में है, लेकिन वर्ष की तीसरी तिमाही में यह केंद्रीय बैंक की ऊपरी सहनशील सीमा के बेहद करीब पहुंच सकती है।
इसके साथ ही, आगामी वित्त वर्ष के लिए मुख्य मुद्रास्फीति (कोर इंफ्लेशन) का अनुमान 4.7 प्रतिशत लगाया गया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था में व्यवधान, कच्चे माल की कीमतों में तेजी, अल नीनो का प्रभाव और मानसून की अनिश्चितता ऐसे कारक हैं जो महंगाई को ऊपर की ओर धकेल सकते हैं। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चिंता जताते हुए कहा कि दक्षिण-पश्चिम मानसून का कमजोर रहना और अल नीनो का खतरा अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, देश में मौजूद पर्याप्त खाद्यान्न भंडार और जलाशयों में पानी का संतोषजनक स्तर इस चिंता के बीच कुछ राहत जरूर देता है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि घरेलू मांग, निर्यात और मजबूत निवेश के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था इस संकट में भी मजबूत बनी रहेगी, परंतु आने वाले समय में वैश्विक हालातों और महंगाई पर पैनी नजर रखी जाएगी।